यस्येरिता साङ्ख्यमयी दृढेह नौ-
र्यया मुमुक्षुस्तरते दुरत्ययम् ।
भवार्णवं मृत्युपथं विपश्चित:
परात्मभूतस्य कथं पृथङ्मति: ॥ १३ ॥
अनुवाद
इस संसार में कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन का प्रचार किया, जो एक मज़बूत नाव है जिसे लोग अज्ञानता के सागर को पार करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। निस्संदेह, भौतिक दुनिया के सागर को पार करने के इच्छुक लोगों को इस दर्शन का सहारा लेना चाहिए। ऐसे एक महान विद्वान व्यक्ति में, जो आध्यात्मिकता के ऊंचे स्तर पर स्थित है, मित्र और शत्रु के बीच कोई भेद कैसे हो सकता है?
Kapil Muni introduced Sankhya philosophy in this world which is a strong boat to cross the ocean of ignorance. Undoubtedly, a person who wants to cross the ocean of Bhava must take shelter of this philosophy. In such a great man, who has attained the highest position of spirituality, how can there be any difference between a friend and an enemy?
तात्पर्य
किसी के द्वारा जब उसकी पारलौकिक स्थिति में प्रोत्साहन किया जाता है (ब्रह्म-भूत) तो वह सदैव प्रसन्नचित्त (प्रसन्नात्मा) रहता है| वह सांसारिक सुख और दुख के भ्रामक भेदों से अछूता रहता है| अतः, ऐसा श्रेष्ठ व्यक्ति समः सर्वेषु भूतेषु होता है; अर्थात, वह प्रत्येक के प्रति समान होता है, प्रिय और शत्रु में कोई भेद नहीं करता| वह किसी भिन्न मत या जाति से जुड़ा नहीं होता और उसे किसी का साथ या विरोध उसकी प्रसन्नता पर कोई प्रभाव नहीं डालता| चूंकि वह निरपेक्ष मंच पर रहता है, जो भौतिक दूषणों से परे होता है, इसलिए उसे परात्मा-भूत या ब्रह्म-भूत कहा जाता है| इसलिए कपिला मुनि सागर महाराज के पुत्रों पर बिल्कुल भी क्रोधित नहीं थे; अपितु, वे स्वयं अपने शरीर की तपिश से ही राख हो गए थे|
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥