श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 8: भगवान् कपिलदेव से सगर-पुत्रों की भेंट  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  9.8.11 
स्वशरीराग्निना तावन्महेन्द्रहृतचेतस: ।
महद्‌व्य‌तिक्रमहता भस्मसादभवन् क्षणात् ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
स्वर्ग के राजा इंद्र के प्रभाव में आकर, सगर के पुत्रों ने अपनी बुद्धि खो दी और एक महान व्यक्तित्व का अपमान कर दिया। परिणामस्वरूप, उनके शरीरों से आग निकलने लगी और वे तुरंत राख में जल गए।
 
Due to the influence of the King of Heaven Indra, the sons of Sagar lost their wisdom and thus they insulted a great man. As a result, fire started coming out of their bodies and they were instantly burnt to ashes.
तात्पर्य
भौतिक शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के संयोजन से बना है। शरीर के अंदर पहले से ही अग्नि होती है, और हमारा व्यावहारिक अनुभव यह है कि इस अग्नि की तपन कभी बढ़ती है और कभी घटती है। सागर महाराजा के पुत्रों के शरीर के अंदर की अग्नि इतनी बढ़ गई थी कि वे सभी जलकर भस्म हो गए। आग की बढ़ी हुई तपन उनकी एक महान व्यक्तित्व के प्रति दुर्व्यवहार के कारण थी। इस तरह के दुर्व्यवहार को महा-व्यतिक्रम कहा जाता है। एक महान व्यक्तित्व का अपमान करने के कारण वे अपने ही शरीर की अग्नि से मारे गए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)