Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 9.7.25-26: इस प्रकार महाराज हरिश्चन्द्र ने पहले अपने मन को सांसारिक भोगों से भरकर उसे पृथ्वी में मिला कर शुद्ध किया। तत्पश्चात उन्होंने पृथ्वी को जल में मिलाया, जल को अग्नि में, अग्नि को वायु में और वायु को आकाश में मिलाया। फिर उन्होंने आकाश को महत्-तत्व में और महत्-तत्व को आध्यात्मिक ज्ञान में मिला दिया। यह आध्यात्मिक ज्ञान स्वयं को परम ईश्वर के अंश रूप में अनुभव करना है। जब स्वयं-साक्षात्कारी आध्यात्मिक जीव भगवान की सेवा में लग जाता है तो वह नित्य रूप से अवर्णनीय और अचिन्त्य हो जाता है। इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होने पर वह भौतिक बंधनों से पूर्णत: मुक्त हो जाता है। | bhagavat अध्याय 9.7: राजा मान्धाता के वंशज । bhagavat स्कन्ध 9: मुक्ति । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इस प्रकार महाराज हरिश्चन्द्र ने पहले अपने मन को सांसारिक भोगों से भरकर उसे पृथ्वी में मिला कर शुद्ध किया। तत्पश्चात उन्होंने पृथ्वी को जल में मिलाया, जल को अग्नि में, अग्नि को वायु में और वायु को आकाश में मिलाया। फिर उन्होंने आकाश को महत्-तत्व में और महत्-तत्व को आध्यात्मिक ज्ञान में मिला दिया। यह आध्यात्मिक ज्ञान स्वयं को परम ईश्वर के अंश रूप में अनुभव करना है। जब स्वयं-साक्षात्कारी आध्यात्मिक जीव भगवान की सेवा में लग जाता है तो वह नित्य रूप से अवर्णनीय और अचिन्त्य हो जाता है। इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होने पर वह भौतिक बंधनों से पूर्णत: मुक्त हो जाता है।
Thus Maharaja Harishchandra first purified his mind, which was full of material enjoyment, by uniting it with the earth. Then he united the earth with water, water with fire, fire with air, and air with space. Then he united the space with the mahat-tattva and the mahat-tattva with spiritual knowledge. This spiritual knowledge is to experience oneself as a part and parcel of the Lord. When a self-realized soul is engaged in the service of the Lord, he is eternally indescribable and inconceivable. Thus, having attained spiritual knowledge, he becomes completely free from material bondage.
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध नौ के अंतर्गत सातवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥