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श्लोक 9.7.20  |
षष्ठं संवत्सरं तत्र चरित्वा रोहित: पुरीम् ।
उपव्रजन्नजीगर्तादक्रीणान्मध्यमं सुतम् ।
शुन:शेफं पशुं पित्रे प्रदाय समवन्दत ॥ २० ॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् छटवें वर्ष वन में घूमने के बाद रोहित अपने पिता की राजधानी में लौट आया। उसने अजीगर्त से उसके दूसरे पुत्र शुनःशेफ को खरीद लिया। फिर उसे लाकर अपने पिता हरिश्चन्द्र को भेंट किया जिससे वह बलि-पशु के रूप में काम आ सके। उसने हरिश्चन्द्र को आदरपूर्वक नमस्कार किया। |
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| तत्पश्चात् छटवें वर्ष वन में घूमने के बाद रोहित अपने पिता की राजधानी में लौट आया। उसने अजीगर्त से उसके दूसरे पुत्र शुनःशेफ को खरीद लिया। फिर उसे लाकर अपने पिता हरिश्चन्द्र को भेंट किया जिससे वह बलि-पशु के रूप में काम आ सके। उसने हरिश्चन्द्र को आदरपूर्वक नमस्कार किया। |
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