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bhagavat 9.7.15: हरिश्चन्द्र अपने बेटे से बहुत ही अधिक प्रेम करता था। इस स्नेह के कारण उसने देवता वरुण से रुकने के लिए कहा। इस प्रकार वरुण सही समय आने की प्रतीक्षा करता रहा।   |   bhagavat अध्याय 9.7: राजा मान्धाता के वंशज   ।   bhagavat स्कन्ध 9: मुक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 7: राजा मान्धाता के वंशज  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  9.7.15 
इति पुत्रानुरागेण स्‍नेहयन्त्रितचेतसा ।
कालं वञ्चयता तं तमुक्तो देवस्तमैक्षत ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
हरिश्चन्द्र अपने बेटे से बहुत ही अधिक प्रेम करता था। इस स्नेह के कारण उसने देवता वरुण से रुकने के लिए कहा। इस प्रकार वरुण सही समय आने की प्रतीक्षा करता रहा।
 
Harishchandra was very fond of his son. Due to this affection he asked Varun Dev to wait. In this way Varun kept waiting for the time to come.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)