श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  9.6.55 
ता: स्वपत्युर्महाराज निरीक्ष्याध्यात्मिकीं गतिम् ।
अन्वीयुस्तत्प्रभावेण अग्निं शान्तमिवार्चिष: ॥ ५५ ॥
 
 
अनुवाद
हे महाराज परीक्षित, अपने पति को अध्यात्म की राह पर बढ़ता देख सौभरि मुनि की पत्नियाँ भी मुनि जी की आध्यात्मिक शक्ति से वैकुण्ठलोक में जा सकीं, जैसे आग बुझने पर उसकी लपटें शांत हो जाती हैं।
 
O King Parīkṣit, seeing their husbands making progress in the spiritual world, the wives of the sage Saubhari also were able to enter Vaikuṇṭhaloka by the sage's spiritual power, just as the flames of a fire are extinguished when it is extinguished.
तात्पर्य
जैसा कि भगवद-गीता (9.32) में कहा गया है, स्त्रियो वैश्य तथा शूद्र तेsपि यांति पराम् गतिम्। आध्यात्मिक सिद्धांतों का पालन करने में महिलाओं को बहुत शक्तिशाली नहीं माना जाता है, लेकिन अगर एक महिला इतनी भाग्यशाली है कि उसे एक उपयुक्त पति मिले तो वह आध्यात्मिक रूप से उन्नत हो और अगर वह हमेशा उसकी सेवा में लगी रहे, तो उसे भी अपने पति के समान ही लाभ मिलता है। यहां यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सौभरि मुनि की पत्नियां भी अपने पति के प्रभाव से आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश करती थीं। वे अयोग्य थीं, लेकिन क्योंकि वे अपने पति की वफादार अनुयायी थीं, वे भी उनके साथ आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश करती थीं। इस प्रकार एक महिला अपने पति की एक वफादार सेविका बननी चाहिए, और अगर पति आध्यात्मिक रूप से उन्नत है, तो महिला को स्वतः ही आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश करने का अवसर मिलेगा।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध नौ के अंतर्गत छठा अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)