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bhagavat 9.6.52: शुरू में मैं अकेला था और मैं सिर्फ योग की तपस्या करता रहता था, परन्तु बाद में जब मैंने मछलियों को देखा जो संभोग में लिप्त थीं तो मेरी इच्छा हुई कि मैं भी विवाह करूं। मैंने पचास पत्नियों से विवाह किए और हर पत्नी से सौ पुत्र हुए, इस प्रकार मेरा परिवार पाँच हजार व्यक्तियों का हो गया। प्रकृति के गुणों के प्रभाव में आकर मेरा पतन हुआ और तब मैंने सोचा कि मैं भौतिक जीवन में सुखी रहूंगा। इस तरह से भौतिक जीवन के प्रति मेरी इच्छाएँ कभी खत्म नहीं होतीं, चाहे यह जीवन हो या आने वाला जीवन।   |   bhagavat अध्याय 9.6: सौभरि मुनि का पतन   ।   bhagavat स्कन्ध 9: मुक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  9.6.52 
एकस्तपस्व्यहमथाम्भसि मत्स्यसङ्गात्
पञ्चाशदासमुत पञ्चसहस्रसर्ग: ।
नान्तं व्रजाम्युभयकृत्यमनोरथानां
मायागुणैर्हृतमतिर्विषयेऽर्थभाव: ॥ ५२ ॥
 
 
अनुवाद
शुरू में मैं अकेला था और मैं सिर्फ योग की तपस्या करता रहता था, परन्तु बाद में जब मैंने मछलियों को देखा जो संभोग में लिप्त थीं तो मेरी इच्छा हुई कि मैं भी विवाह करूं। मैंने पचास पत्नियों से विवाह किए और हर पत्नी से सौ पुत्र हुए, इस प्रकार मेरा परिवार पाँच हजार व्यक्तियों का हो गया। प्रकृति के गुणों के प्रभाव में आकर मेरा पतन हुआ और तब मैंने सोचा कि मैं भौतिक जीवन में सुखी रहूंगा। इस तरह से भौतिक जीवन के प्रति मेरी इच्छाएँ कभी खत्म नहीं होतीं, चाहे यह जीवन हो या आने वाला जीवन।
 
Initially I was alone and used to practice yoga austerities, but later on, because of the company of a mating fish, I desired to marry. Then I became the husband of fifty wives, and each of them produced a hundred sons. Thus my family numbered five thousand members. Influenced by the modes of material nature, I fell and thought that I would be happy in material life. Thus there is no end to my desires for enjoyment in this life and the next.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)