निष्किंचनस्य भगवद्-भजनोन्मुखस्य
पारं परं जिगमिषोर्भव-सागरस्य
संदर्शनं विषयीणां अथ योषितां च
हा हंत हंत विष-भक्षणतोऽप्यसाधु
(चैतन्य-चंद्रोदय-नाटक 8.27)
"हाय, भौतिक सागर को पार करने और भगवान की प्रेमपूर्ण सेवा में बिना भौतिक उद्देश्यों के संलग्न होने की गंभीरता से इच्छा रखने वाले व्यक्ति के लिए, एक भौतिकवादी को इंद्रिय संतुष्टि में लिप्त देखना और एक महिला को जो इसी तरह से रुचि रखती है, उसे देखना स्वेच्छा से जहर पीने से भी अधिक घृणित है।"
जो कोई भी भौतिक बंधन से पूरी तरह से मुक्त होना चाहता है, वह खुद को भगवान की प्रेमपूर्ण सेवा में संलग्न कर सकता है। उसे विषयी - भौतिकवादी व्यक्तियों या यौन जीवन में रुचि रखने वालों से जुड़ना नहीं चाहिए। प्रत्येक भौतिकवादी यौन जीवन में रुचि रखता है। इसलिए स्पष्ट भाषा में यह सलाह दी जाती है कि एक उच्च संत उन लोगों के संग से बचें जो भौतिक रूप से इच्छुक हैं। श्रील नरोत्तम दास ठाकुर भी अनुशंसा करते हैं कि व्यक्ति आचार्यों की सेवा में संलग्न हो, और यदि कोई संगति में रहना चाहता है, तो उसे भक्तों की संगति में रहना चाहिए (तांडेरा चरण सेवा भक्त-सने वास)। कृष्ण भावना आंदोलन केवल भक्त बनाने के लिए कई केंद्र बना रहा है ताकि ऐसे केंद्र के सदस्यों के साथ जुड़कर लोग स्वतः ही भौतिक मामलों में अरूचि रखने लगेंगे। यद्यपि यह एक महत्वाकांक्षी प्रस्ताव है, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से यह संगति प्रभावी साबित हो रही है। कृष्ण भावना आंदोलन के सदस्यों के साथ धीरे-धीरे जुड़कर, केवल प्रसाद ग्रहण करने और हरे कृष्ण मंत्र के जाप में भाग लेने से, साधारण व्यक्ति काफी ऊंचे उठ रहे हैं। सौभरि मुनि को अफसोस है कि पानी के सबसे गहरे हिस्से में भी उनका बुरा संग था। यौन संबंधी मछलियों के बुरे संग के कारण वह नीचे गिर गया। जब तक अच्छा संग न हो तब तक एकांत स्थान भी सुरक्षित नहीं है।
