श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  9.6.48 
एवं गृहेष्वभिरतो विषयान् विविधै: सुखै: ।
सेवमानो न चातुष्यदाज्यस्तोकैरिवानल: ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार से सौभरि मुनि भौतिक जगत में इंद्रियों को सुख देने वाले पदार्थों का उपभोग करते रहे, परंतु वे तनिक भी संतुष्ट नहीं थे, ठीक वैसे ही जैसे लगातार घी की बूँदें मिलती रहने पर आग कभी जलना बंद नहीं करती।
 
Thus the sage Saubhari continued to enjoy sense-gratification in this material world, but he was not at all satisfied, just as a fire never stops burning even if it constantly receives drops of ghee.
तात्पर्य
भौतिक इच्छाएँ एक प्रज्वलित अग्नि के समान हैं। यदि किसी अग्नि को लगातार वसा की बूँदें दी जाएँ, तो अग्नि अधिक से अधिक प्रज्वलित होती जाएगी और कभी भी नहीं बुझेगी। इसलिए भौतिक मांगों को पूरा करके भौतिक इच्छाओं को संतुष्ट करने की नीति कभी भी सफल नहीं होगी। आधुनिक सभ्यता में, हर कोई आर्थिक विकास में लगा हुआ है, जो कि भौतिक अग्नि में लगातार वसा डालने का एक तरीका है। पश्चिमी देश भौतिक सभ्यता की चरम सीमा पर पहुँच चुके हैं, लेकिन लोग अभी भी असंतुष्ट हैं। वास्तविक संतुष्टि कृष्ण चेतना है। इसकी पुष्टि भगवद गीता (5.29) में की गई है, जहाँ कृष्ण कहते हैं:

भोक्तारं यज्ञ-तपसां

सर्व-लोक-महेश्वरम्

सुहृदं सर्व-भूतानाम्

ज्ञात्वा मां शान्तिं ऋच्छति

"जो ऋषि मुझे सभी यज्ञों और तपस्याओं के परम प्रयोजन, सभी ग्रहों और देवताओं के परम प्रभु और सभी जीवित संस्थाओं के हितैषी और शुभचिंतक के रूप में जानते हैं, वे भौतिक दुखों की पीड़ा से शांति प्राप्त करते हैं।" इसलिए व्यक्ति को कृष्ण चेतना में प्रवेश करना चाहिए और नियमों का ठीक से पालन करके कृष्ण चेतना में उन्नति करनी चाहिए। तब व्यक्ति शांति और ज्ञान में एक शाश्वत, आनंदमय जीवन प्राप्त कर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)