श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 6: सौभरि मुनि का पतन  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  9.6.45-46 
स बह्वऋचस्ताभिरपारणीय-
तप:श्रियानर्घ्यपरिच्छदेषु ।
गृहेषु नानोपवनामलाम्भ:-
सरस्सु सौगन्धिककाननेषु ॥ ४५ ॥
महार्हशय्यासनवस्त्रभूषण-
स्‍नानानुलेपाभ्यवहारमाल्यकै: ।
स्वलङ्‍कृत स्त्रीपुरुषेषु नित्यदा
रेमेऽनुगायद्द्विजभृङ्गवन्दिषु ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
सौभरि मुनि मंत्रोच्चारण में सिद्धहस्त थे। इसीलिए उनकी कठिन तपस्या से सुव्यवस्थित घर आभूषण, वस्त्र, सुसज्जित नौकर-नौकरानियां, साफ पानी की झील से युक्त सुंदर उद्यान और फूलों से महकते बगीचे बन गए। पार्कों में कई तरह के सुंदर फूल खिल रहे थे और मधुमक्खियाँ भनभना रही थीं। सौभरि मुनि पेशेवर गायकों से घिरे हुए थे। उनके घर में मूल्यवान बिस्तर, आसन, गहने, स्नान के लिए व्यवस्था और कई तरह के चंदन के लेप, फूलों की माला और स्वादिष्ट व्यंजन मौजूद थे। इस तरह ऐश्वर्य से भरपूर साज-सामान से घिरे हुए सौभरि मुनि अपनी कई पत्नियों के साथ गृहकार्यों में व्यस्त हो गए।
 
Since Saubhari Muni was completely adept in chanting mantras, his arduous penance produced luxurious houses, clothes, ornaments, well-dressed servants and maids, lakes with clean water, and various gardens with parks. The gardens had various kinds of fragrant flowers, chirping birds and humming bumblebees and the Muni was surrounded by professional singers. Saubhari Muni's house had costly beds, seats, ornaments, bathrooms and various kinds of sandalwood paste, flower garlands and delicious dishes. Thus, surrounded by luxurious paraphernalia, Saubhari Muni got busy with household chores with his many wives.
तात्पर्य
सौभारी ऋषि एक महान योगी थे। योगिक सिद्धि आठ भौतिक वैभव उपलब्ध कराती हैं - अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और कामवासायिता। सौभारी मुनि ने अपनी योगिक सिद्धि के द्वारा भौतिक सुख में श्रेष्ठता प्राप्त की। बह्व-ऋचा शब्द का अर्थ है "मंत्रों का उच्चारण करने में विशेषज्ञ"। जैसे भौतिक वैभव को सामान्य भौतिक साधनों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, इसे मंत्रों के माध्यम से भी प्राप्त किया जा सकता है। मंत्रों का जाप करके, सौभारी मुनि ने भौतिक संपन्नता की व्यवस्था की, लेकिन यह जीवन में पूर्णता नहीं थी। जैसा कि देखा जाएगा, सौभारी मुनि भौतिक संपन्नता से बहुत असंतुष्ट हो गए और इस तरह सब कुछ छोड़ दिया और वानप्रस्थ आश्रम में जंगल में फिर से प्रवेश किया और अंतिम सफलता प्राप्त की। जो लोग आत्म-तत्व-विद नहीं हैं, जो जीवन के आध्यात्मिक मूल्य को नहीं जानते हैं, वे बाहरी भौतिक वैभव से संतुष्ट हो सकते हैं, लेकिन जो आत्म-तत्व-विद हैं वे भौतिक वैभव से प्रेरित नहीं होते हैं। यह वह शिक्षा है जिसे हम सौभारी मुनि के जीवन और गतिविधियों से प्राप्त कर सकते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)