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bhagavat 9.5.4: हे भगवान् अच्युत के परम प्रिय, तुम हजारों अरों वाले हो। हे संसार के स्वामी, समस्त हथियारों के विध्वंसक, भगवान की प्रारंभिक दृष्टि, मैं तुम्हें विनम्रतापूर्वक प्रणाम करता हूँ। कृपा करके इस ब्राह्मण को आश्रय दो और उसका मंगल करो।   |   bhagavat अध्याय 9.5: दुर्वासा मुनि को जीवन-दान   ।   bhagavat स्कन्ध 9: मुक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 5: दुर्वासा मुनि को जीवन-दान  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  9.5.4 
सुदर्शन नमस्तुभ्यं सहस्राराच्युतप्रिय ।
सर्वास्त्रघातिन् विप्राय स्वस्ति भूया इडस्पते ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
हे भगवान् अच्युत के परम प्रिय, तुम हजारों अरों वाले हो। हे संसार के स्वामी, समस्त हथियारों के विध्वंसक, भगवान की प्रारंभिक दृष्टि, मैं तुम्हें विनम्रतापूर्वक प्रणाम करता हूँ। कृपा करके इस ब्राह्मण को आश्रय दो और उसका मंगल करो।
 
O dearest to Lord Achyuta, you have a thousand arrows. O Lord of the universe, destroyer of all weapons, the primal sight of the Lord, I offer my respectful obeisances unto you. Kindly give shelter to this Brahmin and do good to him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)