श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 5: दुर्वासा मुनि को जीवन-दान  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  9.5.27 
इत्येतत् पुण्यमाख्यानमम्बरीषस्य भूपते ।
सङ्कीर्तयन्ननुध्यायन् भक्तो भगवतो भवेत् ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
जो कोई भी इस कथा का निरंतर पाठ करता है या महाराज अम्बरीष के कार्यकलापों से जुड़ी इस कथा का चिन्तन करता है, निश्चय ही भगवान का अनन्य भक्त बन जाता है।
 
One who reads this story repeatedly or contemplates upon the story relating to the activities of Maharaja Ambarisha will certainly become a pure devotee of the Lord.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने यहाँ एक बहुत अच्छा उदाहरण दिया है। जब कोई अधिकाधिक पैसे के लिए बहुत उत्सुक होता है, तो वो करोड़पति या अरबपति होने पर भी संतुष्ट नहीं होता, बल्कि किसी भी तरीके से अधिकाधिक पैसा कमाना चाहता है। एक भक्त में भी वही मानसिकता मौजूद होती है। भक्त कभी संतुष्ट नहीं हो पाता, यह सोचकर, "यह मेरी भक्ति की सीमा है।" वह जितना भगवान की सेवा में संलग्न होता है, उतनी ही अधिक सेवा करना चाहता है। यही एक भक्त की स्थिति होती है। महाराजा अम्बरीष, अपने पारिवारिक जीवन में, निश्चित रूप से एक शुद्ध भक्त थे, हर तरह से पूर्ण, क्योंकि उनका मन और उनकी सभी इंद्रियाँ भक्ति में लगी हुई थीं (स व मनः कृष्ण-पदाराविंदयोर्वाचांसि वैकुण्ठ-गुणानुवर्णने)। महाराजा अम्बरीष आत्म-संतुष्ट थे क्योंकि उनकी सभी इंद्रियाँ भक्ति में लगी हुई थीं (सर्वोपाधि-विर्निर्मुक्तं तत्परत्वेन निरमलम्/ हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्ति उच्यते)। फिर भी, यद्यपि महाराजा अम्बरीष ने अपनी सभी इंद्रियों को भक्ति में लगाया था, उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और कृष्ण के चरण कमलों में अपने मन को पूरी तरह से केंद्रित करने के लिए जंगल चले गए, ठीक वैसे ही जैसे एक व्यापारी, धन में पूर्ण होने पर भी, अधिकाधिक कमाने की कोशिश करता है। भक्ति में अधिकाधिक संलग्न होने की यह मानसिकता व्यक्ति को सबसे ऊँचे स्थान पर ले जाती है। जबकि कर्म प्लेटफॉर्म पर वह व्यापारी जो अधिकाधिक पैसा चाहता है वह अधिकाधिक बाध्य और उलझता जाता है, भक्त अधिकाधिक मुक्त हो जाता जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)