श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 5: दुर्वासा मुनि को जीवन-दान  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  9.5.25 
एवं विधानेकगुण: स राजा
परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे ।
क्रियाकलापै: समुवाह भक्तिं
ययाविरिञ्‍च्यान् निरयांश्चकार ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अपनी भक्ति के कारण नाना प्रकार के दिव्य गुणों से युक्त महाराज अम्बरीष ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान श्री कृष्ण को भली भाँति जान गये और उसी प्रकार उनकी भक्ति करने लगे। अपनी भक्ति के कारण उन्हें इस भौतिक जगत का सर्वोच्च लोक भी नरक के समान ही प्रतीत होने लगा।
 
In this way, due to his devotion, Maharaj Ambarish, who was endowed with various types of divine qualities, became well aware of Brahma, Supreme Soul and God and started worshiping in the right manner. Due to his devotion, even the highest world of this material world began to seem like hell to him.
तात्पर्य
ब्रह्म , परमात्मा और भगवान् के पूर्ण ज्ञान वाले महाराजा अम्बरीष जैसे उच्च और शुद्ध भक्त, दूसरे शब्दों में, वासुदेव, कृष्ण के भक्त निरपेक्ष सत्य के अन्य पहलुओं के पूर्ण ज्ञान रखते हैं। निरपेक्ष सत्य तीन पहलुओं में महसूस किया जाता है - ब्रह्म , परमात्मा और भगवान(ब्रह्मेति परमात्मेति भगवान् इति शब्दयते)। भगवान् वासुदेव, के एक भक्त सब कुछ जानता है (वासुदेवः सर्वमिति) क्योंकि वासुदेव, कृष्ण, परमात्मा और ब्रह्म दोनों को शामिल करता है। योग प्रणाली द्वारा परमात्मा का एहसास करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वासुदेव के बारे में हमेशा सोचने वाला भक्त सर्वोच्च योगी है (योगिनाम अपि सर्वेषाम)। और जहां तक ​​ज्ञान का सवाल है, अगर कोई वासुदेव का एक पूर्ण भक्त है, तो वह सबसे महान महात्मा है (वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः)। एक महात्मा वह है जिसे निरपेक्ष सत्य का पूरा ज्ञान है। इस प्रकार महाराजा अम्बरीष, भगवान के व्यक्तित्व के भक्त होने के नाते, परमात्मा, ब्रह्म, माया, भौतिक दुनिया, आध्यात्मिक दुनिया और किस तरह हर जगह चीजें चल रही हैं, के बारे में पूरी तरह से अवगत थे। सब कुछ उनके लिए जाना जाता था। यस्मिन् विज्ञाते सर्वम एवं विज्ञातं भवति। क्योंकि भक्त वासुदेव को जानता है, वह वासुदेव की रचना के भीतर सब कुछ जानता है (वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः)। ऐसा भक्त इस भौतिक दुनिया में उच्चतम स्तर की खुशी को ज्यादा महत्व नहीं देता है।

नारायण-पराः सर्वे

ना कुतश्चन बिभ्यति

स्वर्गापवर्ग-नारकेष्व

अपि तुल्यार्था-दर्शिनः

(भाग 6.17.28)

क्योंकि वह भक्ति सेवा में तय है, एक भक्त भौतिक दुनिया में किसी भी स्थिति को महत्वपूर्ण नहीं मानता है। श्रील प्रबोधानंद सरस्वती ने इसलिए लिखा है (चैतन्य-चंद्रामृत 5):

कैवल्यं नरकायते त्रिदश-पूर आकाश-पुष्पायते

दुर्दांतेंद्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खाता-दंष्ट्रायते

विश्वं पूर्ण-सुखायते विधि-महेंद्रादिश च कीटायते

यत्-कारुण्य-कटाक्ष-वैभववतां तं गौरम एव स्तुमः

जो चैतन्य महाप्रभु जैसी महान हस्तियों के प्रति भक्ति सेवा के माध्यम से शुद्ध भक्त बन जाता है, उसके लिए कैवल्य, या ब्रह्म में विलय, नरक से बेहतर नहीं लगता। जहां तक ​​स्वर्गीय ग्रहों का सवाल है, एक भक्त के लिए वे एक फैंटैस्मैगोरिया या विल-ओ'-द-विस्प जैसे हैं, और जहां तक ​​योगिक पूर्णता का संबंध है, एक भक्त को ऐसी पूर्णता की परवाह नहीं है, क्योंकि योगिक पूर्णता का उद्देश्य भक्त द्वारा स्वचालित रूप से प्राप्त किया जाता है। यह सब तब संभव है जब कोई चैतन्य महाप्रभु के निर्देशों के माध्यम से भगवान का भक्त बन जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)