नारायण-पराः सर्वे
ना कुतश्चन बिभ्यति
स्वर्गापवर्ग-नारकेष्व
अपि तुल्यार्था-दर्शिनः
(भाग 6.17.28)
क्योंकि वह भक्ति सेवा में तय है, एक भक्त भौतिक दुनिया में किसी भी स्थिति को महत्वपूर्ण नहीं मानता है। श्रील प्रबोधानंद सरस्वती ने इसलिए लिखा है (चैतन्य-चंद्रामृत 5):
कैवल्यं नरकायते त्रिदश-पूर आकाश-पुष्पायते
दुर्दांतेंद्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खाता-दंष्ट्रायते
विश्वं पूर्ण-सुखायते विधि-महेंद्रादिश च कीटायते
यत्-कारुण्य-कटाक्ष-वैभववतां तं गौरम एव स्तुमः
जो चैतन्य महाप्रभु जैसी महान हस्तियों के प्रति भक्ति सेवा के माध्यम से शुद्ध भक्त बन जाता है, उसके लिए कैवल्य, या ब्रह्म में विलय, नरक से बेहतर नहीं लगता। जहां तक स्वर्गीय ग्रहों का सवाल है, एक भक्त के लिए वे एक फैंटैस्मैगोरिया या विल-ओ'-द-विस्प जैसे हैं, और जहां तक योगिक पूर्णता का संबंध है, एक भक्त को ऐसी पूर्णता की परवाह नहीं है, क्योंकि योगिक पूर्णता का उद्देश्य भक्त द्वारा स्वचालित रूप से प्राप्त किया जाता है। यह सब तब संभव है जब कोई चैतन्य महाप्रभु के निर्देशों के माध्यम से भगवान का भक्त बन जाता है।
