श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 5: दुर्वासा मुनि को जीवन-दान  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  9.5.22 
श्रीशुक उवाच
एवं सङ्कीर्त्य राजानं दुर्वास: परितोषित: ।
ययौ विहायसामन्‍त्र्य ब्रह्मलोकमहैतुकम् ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार हर प्रकार से संतुष्ट होकर महान योगी दुर्वासा ने अनुमति ली और राजा की लगातार प्रशंसा करते हुए वहाँ से चले गए। वे आकाश मार्ग से ब्रह्मलोक पहुँचे जो शुष्क ज्ञानियों से रहित है।
 
Sri Sukadeva Goswami further said: Thus, being satisfied in every way, the great Yogi Durvasa took permission and went away from there while continuously praising the king. He went to Brahmaloka through the sky route which is devoid of dry knowledgeable people.
तात्पर्य
हालाँकि दुरवास मुनि अंतरिक्ष के रास्ते ब्रह्मलोक वापस चले गए, उन्हें विमान की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि महान रहस्यवादी योगी किसी भी ग्रह से किसी भी दूसरे ग्रह पर बिना किसी मशीन के जा सकते हैं। सिद्धलोक नाम का एक ग्रह है जिसके निवासी किसी भी अन्य ग्रह पर जा सकते हैं क्योंकि वे स्वाभाविक रूप से योगाभ्यास की सभी सिद्धता रखते हैं। इस प्रकार दुरवास मुनि, महान रहस्यवादी योगी, ब्रह्मलोक सहित किसी भी ग्रह पर आकाश के रास्ते जा सकते थे। ब्रह्मलोक में, हर कोई आत्म-साक्षात्कारित है, और इस तरह परम सत्य के निष्कर्ष पर आने के लिए दार्शनिक अटकलों की कोई आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मलोक जाने में दुरवास मुनि का उद्देश्य स्पष्ट रूप से ब्रह्मलोक के निवासियों से बात करना था कि एक भक्त कितना शक्तिशाली होता है और कैसे एक भक्त इस भौतिक जगत की हर जीवित सत्ता से आगे निकल सकता है। तथाकथित ज्ञानी और योगी एक भक्त की तुलना नहीं कर सकते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)