प्रीतोऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि तव भागवतस्य वै ।
दर्शनस्पर्शनालापैरातिथ्येनात्ममेधसा ॥ २० ॥
अनुवाद
दुर्वासा मुनि ने कहा : हे राजन् ! मैं आपसे बहुत प्रसन्न हूँ। पहले तो मैं आपको एक साधारण मनुष्य समझकर आपके आतिथ्य का स्वीकार कर लिया था, लेकिन बाद में मैंने अपनी बुद्धि से समझ लिया कि आप भगवान के बहुत बड़े भक्त हैं। इसलिए केवल आपको देखकर, आपके चरणों का स्पर्श करके और आपसे बात करके मैं संतुष्ट हो गया हूँ और आपका बहुत आभारी हो गया हूँ।
Sage Durvasa said: O king, I am very pleased with you. At first I accepted your hospitality thinking you to be an ordinary person, but later I could understand with my intelligence that you are a very great devotee of God. Therefore, just by seeing you, touching your feet and talking to you, I am satisfied and very grateful to you.
तात्पर्य
ऐसा कहा जाता है, वैष्णवेर क्रिया मुद्रा विज्ञेह ना बुझय: यहाँ तक कि अति बुद्धिमान व्यक्ति भी शुद्ध वैष्णव की क्रियाओं को समझ नहीं सकता। इसलिए, यद्यपि दुर्वासा मुनि एक महान रहस्यवादी योगी थे, फिर भी उन्होंने सर्वप्रथम महाराज अम्बरीष को एक सामान्य मनुष्य समझ लिया और उन्हें दंडित करना चाह्ते थे। वैष्णव के बारे में ऐसा ही गलत विचार होता है। तथापि, जब दुर्वासा मुनि सुदर्शन चक्र द्वारा सताए जा रहे थे, तब उनकी बुद्धि विकसित हुई। इसलिए आत्ममेधसा शब्द का उपयोग यह इंगित करने के लिए किया जाता है कि अपने व्यक्तिगत अनुभव से वे समझेंगे कि राजा कितने महान वैष्णव हैं। जब दुर्वासा मुनि को सुदर्शन चक्र द्वारा खदेड़ा जा रहा था, तो वे भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव की शरण लेना चाहते थे, और वे आध्यात्मिक दुनिया में जाने, भगवान से मिलने और उनसे आमने-सामने बात करने में भी सक्षम थे, फिर भी वे सुदर्शन चक्र के प्रहार से नहीं बच सके। इस प्रकार वे वैष्णव के प्रभाव को व्यक्तिगत अनुभव से समझ सके। दुर्वासा मुनि निश्चित रूप से एक महान योगी और अत्यंत विद्वान ब्राह्मण थे, लेकिन वास्तविक योगी होने के बावजूद वे वैष्णव के प्रभाव को समझने में असमर्थ थे। इसलिए, ऐसा कहा जाता है, वैष्णवेर क्रिया मुद्रा विज्ञेह ना बुझय: यहाँ तक कि सर्वाधिक विद्वान व्यक्ति भी वैष्णव के मूल्य को समझ नहीं सकता। तथाकथित ज्ञानी और योगियों के लिए वैष्णव के चरित्र का अध्ययन करते समय भूल होने की हमेशा संभावना रहती है। एक वैष्णव को उसके अद्भुत कार्यों के संदर्भ में यह समझ कर जाना जा सकता है कि भगवान उन्हें कितना अधिक पसंद करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥