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bhagavat 9.5.15: जिन लोगों ने शुद्ध भक्तों के स्वामी परमेश्वर को प्राप्त कर लिया है, उनके लिए क्या करना असंभव है और क्या त्यागना असंभव है?   |   bhagavat अध्याय 9.5: दुर्वासा मुनि को जीवन-दान   ।   bhagavat स्कन्ध 9: मुक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 5: दुर्वासा मुनि को जीवन-दान  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  9.5.15 
दुष्कर: को नु साधूनां दुस्त्यजो वा महात्मनाम् ।
यै: संगृहीतो भगवान् सात्वतामृषभो हरि: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
जिन लोगों ने शुद्ध भक्तों के स्वामी परमेश्वर को प्राप्त कर लिया है, उनके लिए क्या करना असंभव है और क्या त्यागना असंभव है?
 
What is impossible to do and what is impossible to give up for those who have attained the Lord, the Lord of pure devotees?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)