|
| |
| |
श्लोक 9.4.70  |
तपो विद्या च विप्राणां नि:श्रेयसकरे उभे ।
ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा ॥ ७० ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| ब्राह्मण के किए गए तप और विद्या तो कल्याणकारी ही होते हैं, पर जब ये तप और विद्या अति अभिमानी में होते हैं तो इनसे बड़ा दूसरा कोई हानिकारक नहीं होता। |
| |
| ब्राह्मण के किए गए तप और विद्या तो कल्याणकारी ही होते हैं, पर जब ये तप और विद्या अति अभिमानी में होते हैं तो इनसे बड़ा दूसरा कोई हानिकारक नहीं होता। |
| ✨ ai-generated |
| |
|