तपो विद्या च विप्राणां नि:श्रेयसकरे उभे ।
ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा ॥ ७० ॥
अनुवाद
ब्राह्मण के किए गए तप और विद्या तो कल्याणकारी ही होते हैं, पर जब ये तप और विद्या अति अभिमानी में होते हैं तो इनसे बड़ा दूसरा कोई हानिकारक नहीं होता।
Penance and learning are certainly beneficial for a Brahmin, but when penance and learning are in the possession of a person who is not humble, they are extremely fatal.
तात्पर्य
ऐसा कहा जाता है कि एक रत्न अत्यंत मूल्यवान होता है, परन्तु जब वह एक नाग-फनी पर होता है, तब वह अपने मूल्य के बावजूद खतरनाक होता है। इसी तरह, जब एक भौतिकवादी निराग्य्रही व्यक्ति अध्ययन और तपस्या में महान सफलता प्राप्त करता है, तो वह सफलता समाज के लिए खतरनाक होती है। उदाहरण के लिए, तथाकथित विद्वान वैज्ञानिकों ने परमाणु हथियारों का आविष्कार किया जो पूरी मानवता के लिए खतरनाक हैं। इसलिए कहा जाता है, मणिना भूषितः सर्पः किं असौ न भयङ्करः। अपने फन पर रत्न धारण किए हुए नाग भी रत्न के बिना वाले नाग के समान खतरनाक है। दुर्वासा मुनि एक अत्यधिक विद्वान ब्राह्मण थे जो रहस्यमय शक्ति से सुसज्जित थे, परन्तु क्योंकि वह सज्जन पुरूष नहीं थे, वह अपनी शक्ति का उपयोग करना नहीं जानते थे। इसलिए वे अत्यंत खतरनाक थे। भगवान का परम व्यक्तित्व कभी भी एक खतरनाक व्यक्ति की ओर नहीं झुकते जो अपनी रहस्यमय शक्ति का उपयोग किसी व्यक्तिगत डिजाइन के लिए करता है। इसलिए, प्रकृति के नियमों से, शक्ति का ऐसा दुरुपयोग अंततः समाज के लिए नहीं बल्कि उस व्यक्ति के लिए खतरनाक होता है जो इसका दुरुपयोग करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥