श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  9.4.69 
उपायं कथयिष्यामि तव विप्र श‍ृणुष्व तत् ।
अयं ह्यात्माभिचारस्ते यतस्तं याहि मा चिरम् ।
साधुषु प्रहितं तेज: प्रहर्तु: कुरुतेऽशिवम् ॥ ६९ ॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण, अब मैं तुम्हारे बचाव के लिए उपदेश दे रहा हूँ। ध्यान से सुनो। महाराज अम्बरीष का अपमान करके तुमने अपने आत्म-द्वेष का परिचय दिया है। इसलिए ज़रा भी देर न करते हुए तुरंत उनके पास जाओ। एक व्यक्ति की वह ताकत जिसका इस्तेमाल किसी भक्त के विरोध में किया जाए, वो ताकत इस्तेमाल करने वाले को ही नुकसान पहुँचाती है। मतलब जो व्यक्ति शक्ति का उपयोग करता है उसे नुकसान पहुँचता है, न कि उसे जिस पर शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
 
हे ब्राह्मण, अब मैं तुम्हारे बचाव के लिए उपदेश दे रहा हूँ। ध्यान से सुनो। महाराज अम्बरीष का अपमान करके तुमने अपने आत्म-द्वेष का परिचय दिया है। इसलिए ज़रा भी देर न करते हुए तुरंत उनके पास जाओ। एक व्यक्ति की वह ताकत जिसका इस्तेमाल किसी भक्त के विरोध में किया जाए, वो ताकत इस्तेमाल करने वाले को ही नुकसान पहुँचाती है। मतलब जो व्यक्ति शक्ति का उपयोग करता है उसे नुकसान पहुँचता है, न कि उसे जिस पर शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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