श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  9.4.67 
मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादिचतुष्टयम् ।
नेच्छन्ति सेवया पूर्णा: कुतोऽन्यत् कालविप्लुतम् ॥ ६७ ॥
 
 
अनुवाद
मेरे भक्त जो मेरी प्रेमाभक्ति में लगे रहकर सदैव संतुष्ट रहते हैं, वे मोक्ष के चार सिद्धांत (सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य तथा सार्ष्टि) में भी तनिक रुचि नहीं रखते, यद्यपि उनकी सेवा से ये उन्हें स्वतः प्राप्त हो जाते हैं। फिर स्वर्गलोक जाने के नश्वर सुख के विषय में क्या कहा जाए?
 
My devotees who are always satisfied by being devoted to My loving devotion are not interested in the four principles of salvation (Saalokya, Sarupya, Samipya and Sarshti) even though they automatically get them by their service. Then what can be said about the perishable happiness of going to heaven?
तात्पर्य
मुक्ति के मूल्य का अनुमान श्रील बिल्वमंगल ठाकुर ने निम्न प्रकार से किया है:

मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलिः सेवतेऽस्मान्

धर्मार्थ-काम-गतियाः समय-प्रतीक्षाः

बिल्वमंगल ठाकुर को एहसास हुआ कि यदि कोई भगवान् के प्रति अपनी स्वाभाविक भक्ति सेवा को विकसित करता है, तो मुक्ति उसके सामने हाथ जोड़े सभी प्रकार की सेवा अर्पित करने के लिए खड़ी रहती है। दूसरे शब्दों में, भक्त पहले ही मुक्त हो चुका है। उसे विभिन्न प्रकार की मुक्ति की आकांक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती है। शुद्ध भक्त स्वतः ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है, चाहे वह इसकी इच्छा न भी करता हो।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)