मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलिः सेवतेऽस्मान्
धर्मार्थ-काम-गतियाः समय-प्रतीक्षाः
बिल्वमंगल ठाकुर को एहसास हुआ कि यदि कोई भगवान् के प्रति अपनी स्वाभाविक भक्ति सेवा को विकसित करता है, तो मुक्ति उसके सामने हाथ जोड़े सभी प्रकार की सेवा अर्पित करने के लिए खड़ी रहती है। दूसरे शब्दों में, भक्त पहले ही मुक्त हो चुका है। उसे विभिन्न प्रकार की मुक्ति की आकांक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती है। शुद्ध भक्त स्वतः ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है, चाहे वह इसकी इच्छा न भी करता हो।
