श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  9.4.65 
ये दारागारपुत्राप्तप्राणान् वित्तमिमं परम् ।
हित्वा मां शरणं याता: कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे ॥ ६५ ॥
 
 
अनुवाद
शुद्ध भक्त मेरे लिए अपने घर, पत्नियाँ, बच्चे, रिश्तेदार, धन और यहाँ तक कि अपना जीवन भी त्याग देते हैं, बिना इस जीवन में या अगले जीवन में किसी भी भौतिक उन्नति की इच्छा के, सिर्फ़ मेरी सेवा करने के लिए। तो मैं ऐसे भक्तों को कभी छोड़ नहीं सकता।
 
Since pure devotees abandon their homes, wives, children, relatives, wealth and even their lives simply to serve Me, without any desire for any material advancement in this life or the next, how can I ever abandon such devotees?
तात्पर्य
परमेश्वर भगवान की पूजा ब्राह्मण्य-देवाय गो-ब्राह्मण-हिताय च नाम से की जाती है। इस प्रकार वे ब्राह्मणों के हितैषी हैं। दुर्वासा मुनि निश्चित रूप से एक बहुत महान ब्राह्मण थे, परन्तु चूँकि वे भक्त नहीं थे, वे भक्ति सेवा में अपना सर्वस्व नहीं होम सके। महान योगी वास्तव में स्वार्थी होते हैं। इसका प्रमाण है कि जब दुर्वासा मुनि ने महाराज अम्बरिश को मारने के लिए एक दानव बनाया, तो राजा अपनी जगह पर स्थिर रहे, परमेश्वर भगवान से प्रार्थना करते हुए और पूरी तरह से उन पर निर्भर रहते हुए, जबकि जब दुर्वासा मुनि का भगवान की सर्वोच्च इच्छा से सुदर्शन चक्र ने पीछा किया, तो वे इतने विचलित हो गए कि वे पूरे विश्व में भाग गए और ब्रह्माण्ड के हर नुक्कड़ और कोने में छिपने का प्रयास किया। अंत में, अपने जीवन के डर से, वे भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव और अंत में परमेश्वर भगवान के पास पहुँचे। वे अपने शरीर में इतने रुचिपूर्ण थे कि वे एक वैष्णव के शरीर को मारना चाहते थे। इसलिए, उनकी बुद्धि बहुत अच्छी नहीं थी, और एक अभुद्धिमान व्यक्ति को परमेश्वर भगवान कैसे उद्धार कर सकते हैं? भगवान निश्चित रूप से अपने भक्तों को, जिन्होंने उसकी सेवा के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया है, सभी प्रकार की सुरक्षा देने का प्रयास करते हैं। इस छंद में एक अन्य बिंदु यह है कि दारागारा-पुत्राप्त - घर, पत्नी, बच्चे, दोस्ती, समाज और प्रेम - के प्रति आसक्ति परमेश्वर भगवान की कृपा प्राप्त करने का रास्ता नहीं है। जो अपने घर और आशियाने से पदार्थिक सुख की चाहत में जुड़ा है, वह विशुद्ध भक्त नहीं बन सकता है। कभी-कभी एक विशुद्ध भक्त को पत्नी, बच्चों और घर के प्रति आदत या आकर्षण हो सकता है, पर साथ ही, वह अपनी पूरी क्षमता से सर्वोच्च प्रभु की सेवा करना चाहता है। ऐसे भक्त के लिए, भगवान उसकी झूठी आसक्ति की चीजों को हटाने और इस प्रकार उसको पत्नी, घर, बच्चों, दोस्तों वगैरह से मुक्त करने की विशेष व्यवस्था करते हैं। यह भक्त पर विशेष कृपा है, उसे घर वापस लाने के लिए, वापस परमात्मा के पास लाने के लिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)