श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  9.4.63 
श्रीभगवानुवाच
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज ।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रिय: ॥ ६३ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने उस ब्राह्मण से कहा: मैं अपने भक्तों के पूर्णत: वश में हूँ। वास्तव में, मैं बिलकुल भी स्वतंत्र नहीं हूँ। चूँकि मेरे भक्त भौतिक इच्छाओं से पूर्णत: रहित होते हैं, इसलिए मैं केवल उनके हृदयों में ही निवास करता हूँ। मेरे भक्त क्या, मेरे भक्तों के भक्त भी मेरे बहुत प्रिय हैं।
 
The Lord told the brahmin: I am completely under the control of My devotees. Of course, I am not independent at all. Since My devotees are completely free from material desires, I reside in their hearts. Not only My devotees but also the devotees of My devotees are very dear to Me.
तात्पर्य
ब्रह्मा और शिव समेत सारे महान और अडिग व्यक्तित्व, भगवान के पूर्ण नियंत्रण में हैं, लेकिन भगवान अपने भक्तों के पूर्ण नियंत्रण में हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि एक भक्त अन्याभिलाषिता-शून्य होता है; दूसरे शब्दों में, उसके हृदय में कोई भौतिक इच्छाएं नहीं होती हैं। उसकी केवल एक ही इच्छा होती है, भगवान के बारे में हमेशा सोचना और उनकी सर्वोत्तम सेवा कैसे की जाए। इस पारलौकिक योग्यता के कारण, भगवान अपने भक्तों के प्रति बहुत अनुकूल होते हैं - वास्तव में, केवल भक्तों के प्रति ही नहीं, बल्कि भक्तों के भक्तों के प्रति भी। श्रील नरसिंह दास ठाकुर कहते हैं, छड़िया वैष्णव सेवा निस्तारा पायेचे केबा: भक्तों की सेवा के बिना, कोई भी भौतिक उलझाव से मुक्त नहीं हो सकता है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं को गोपी-भरतुः पद-कमलयोर दास-दासानुदासः बताया। इस प्रकार उन्होंने हमें सिखाया कि सीधे कृष्ण के सेवक नहीं, बल्कि कृष्ण के सेवक के सेवक बनें। ब्रह्मा, नारद, व्यासदेव और शुकदेव गोस्वामी जैसे भक्त सीधे कृष्ण के सेवक हैं, और जो नारद, व्यासदेव और शुकदेव का सेवक बन जाता है, जैसे छह गोस्वामी हैं, वह और भी अधिक समर्पित होता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इसलिए कहते हैं, यस्य प्रसादाद भगवत-प्रसादः: यदि कोई बहुत ईमानदारी से गुरु की सेवा करता है, तो कृष्ण निश्चित रूप से उस भक्त के प्रति अनुकूल हो जाते हैं। भगवान के निर्देशों का पालन करने से कहीं अधिक मूल्यवान है भक्तों के निर्देशों का पालन करना।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)