श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 53-54
 
 
श्लोक  9.4.53-54 
श्रीब्रह्मोवाच
स्थानं मदीयं सहविश्वमेतत्
क्रीडावसाने द्विपरार्धसंज्ञे ।
भ्रूभङ्गमात्रेण हि सन्दिधक्षो:
कालात्मनो यस्य तिरोभविष्यति ॥ ५३ ॥
अहं भवो दक्षभृगुप्रधाना:
प्रजेशभूतेशसुरेशमुख्या: ।
सर्वे वयं यन्नियमं प्रपन्ना
मूर्ध्‍न्यार्पितं लोकहितं वहाम: ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी ने कहा: द्वि-परार्ध के अंत में, जब भगवान् की लीलाएं पूरी होती हैं, तो भगवान् विष्णु अपनी एक भौंह के टेढ़े होने से पूरे ब्रह्मांड को नष्ट कर देते हैं, जिसमें हमारे निवास स्थान भी शामिल हैं। मैं और शिवजी जैसे लोग और दक्ष, भृगु आदि प्रमुख ऋषि-मुनि और जीवों के शासक, मानव समाज के शासक और देवताओं के शासक, हम सभी उस भगवान् विष्णु की शरण में जाते हैं और अपने सिर झुकाकर सभी जीवों के कल्याण के लिए उनके आदेशों का पालन करते हैं।
 
Brahma said: At the end of the Dwi-parardha, when the Lord's pastimes are over, Lord Vishnu destroys the entire universe, including our abode, by the crook of one of His eyebrows. I and men like Lord Shiva and the chief sages like Daksha, Bhrigu, etc. and the rulers of the living entities, the rulers of human society and the rulers of the gods, all of us bow our heads to Lord Vishnu and take refuge in Him to follow His orders for the welfare of all living entities.
तात्पर्य
भगवद् गीता (10.34) में कहा गया है, मृत्युः सर्व-हरश् चाहम: जब भगवान, मृत्यु के रूप में या समय के सर्वोच्च नियंत्रक के रूप में आते हैं, तो वे सब कुछ छीन लेते हैं। दूसरे शब्दों में, सारा वैभव, प्रतिष्ठा और हमारे पास जो कुछ भी है वह भगवान द्वारा किसी उद्देश्य के लिए दिया गया है। समर्पित आत्मा का कर्तव्य सर्वोच्च के आदेशों का पालन करना है। कोई भी उनकी अवहेलना नहीं कर सकता। परिस्थितियों में, भगवान ब्रह्मा ने भगवान द्वारा भेजे गए शक्तिशाली सुदर्शन चक्र से दुर्वासा मुनि को आश्रय देने से इनकार कर दिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)