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श्लोक 9.4.47  |
तामापतन्तीं ज्वलतीमसिहस्तां पदा भुवम् ।
वेपयन्तीं समुद्वीक्ष्य न चचाल पदान्नृप: ॥ ४७ ॥ |
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| अनुवाद |
| हाथ में त्रिशूल लेकर और अपने कदमों की गड़गड़ाहट से धरती को हिलाते हुए, वह चमकती हुई प्राणी महाराज अम्बरीष के सामने आ गई। लेकिन उसे देखकर राजा तनिक भी परेशान नहीं हुआ और अपने स्थान से थोड़ा भी नहीं हिला। |
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| हाथ में त्रिशूल लेकर और अपने कदमों की गड़गड़ाहट से धरती को हिलाते हुए, वह चमकती हुई प्राणी महाराज अम्बरीष के सामने आ गई। लेकिन उसे देखकर राजा तनिक भी परेशान नहीं हुआ और अपने स्थान से थोड़ा भी नहीं हिला। |
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