यो मामतिथिमायातमातिथ्येन निमन्त्र्य च ।
अदत्त्वा भुक्तवांस्तस्य सद्यस्ते दर्शये फलम् ॥ ४५ ॥
अनुवाद
महाराज अम्बरीष, तूने मुझे अतिथि मानकर भोजन के लिए बुलाया, परन्तु खाने के बजाय पहले तूने खूब खा लिया है। तेरे इस बुरे व्यवहार के कारण मैं तुझे इसका दण्ड देना चाहता हूँ।
Maharaj Ambrish, you have invited me as a guest for dinner but instead of feeding me, you have eaten first. I will make you pay for this misbehavior of yours.
तात्पर्य
एक भक्त को तथाकथित योगी पराजित नहीं कर सकता। यह इस बात से सिद्ध होता है कि महाराज अम्बरिश को दंडित करने के लिए दुर्वासा मुनि का प्रयास विफल हो गया। हराव अभक्तस्य कुतो महद्गुणा: (भागवत 5.18.12)। जो परमेश्वर का पवित्र भक्त नहीं है, उसके पास कोई अच्छे गुण नहीं हो सकते, फिर चाहे वह कितना भी महान रहस्यवादी, दार्शनिक या कर्मकांडी क्यों न हो। केवल एक भक्त ही सभी परिस्थितियों में विजयी होता है, जैसा कि दुर्वासा और महाराज अम्बरिश के बीच प्रतिद्वंद्विता की इस घटना में दिखाया जाएगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥