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श्लोक 9.4.4-5  |
तांस्त्वं शंसय सूक्ते द्वे वैश्वदेवे महात्मन: ।
ते स्वर्यन्तो धनं सत्रपरिशेषितमात्मन: ॥ ४ ॥
दास्यन्ति तेऽथ तान्गच्छ तथा स कृतवान् यथा ।
तस्मै दत्त्वा ययु: स्वर्गं ते सत्रपरिशेषणम् ॥ ५ ॥ |
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| अनुवाद |
| नाभाग के पिता ने आगे कहा : “उन महापुरुषों के पास जाओ और उन्हें वैश्वदेव से संबंधित दो वैदिक मंत्र सुनाओ। जब वो महापुरुष यज्ञ समाप्त करके स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करेंगे तो वे तुम्हें यज्ञ में प्राप्त धन का बचा हुआ दान देंगे। अतः तुम तुरंत जाओ।” इस प्रकार नाभाग ने ऐसा ही किया जैसा उसके पिता ने सलाह दी थी और अंगिरा वंश के सभी ऋषियों ने उसे अपना पूरा धन दे दिया और फिर स्वर्गलोक चले गए। |
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| नाभाग के पिता ने आगे कहा : “उन महापुरुषों के पास जाओ और उन्हें वैश्वदेव से संबंधित दो वैदिक मंत्र सुनाओ। जब वो महापुरुष यज्ञ समाप्त करके स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करेंगे तो वे तुम्हें यज्ञ में प्राप्त धन का बचा हुआ दान देंगे। अतः तुम तुरंत जाओ।” इस प्रकार नाभाग ने ऐसा ही किया जैसा उसके पिता ने सलाह दी थी और अंगिरा वंश के सभी ऋषियों ने उसे अपना पूरा धन दे दिया और फिर स्वर्गलोक चले गए। |
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