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bhagavat 9.4.4-5: नाभाग के पिता ने आगे कहा : “उन महापुरुषों के पास जाओ और उन्हें वैश्वदेव से संबंधित दो वैदिक मंत्र सुनाओ। जब वो महापुरुष यज्ञ समाप्त करके स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करेंगे तो वे तुम्हें यज्ञ में प्राप्त धन का बचा हुआ दान देंगे। अतः तुम तुरंत जाओ।” इस प्रकार नाभाग ने ऐसा ही किया जैसा उसके पिता ने सलाह दी थी और अंगिरा वंश के सभी ऋषियों ने उसे अपना पूरा धन दे दिया और फिर स्वर्गलोक चले गए।   |   bhagavat अध्याय 9.4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान   ।   bhagavat स्कन्ध 9: मुक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  9.4.4-5 
तांस्त्वं शंसय सूक्ते द्वे वैश्वदेवे महात्मन: ।
ते स्वर्यन्तो धनं सत्रपरिशेषितमात्मन: ॥ ४ ॥
दास्यन्ति तेऽथ तान्गच्छ तथा स कृतवान् यथा ।
तस्मै दत्त्वा ययु: स्वर्गं ते सत्रपरिशेषणम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
नाभाग के पिता ने आगे कहा : “उन महापुरुषों के पास जाओ और उन्हें वैश्वदेव से संबंधित दो वैदिक मंत्र सुनाओ। जब वो महापुरुष यज्ञ समाप्त करके स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करेंगे तो वे तुम्हें यज्ञ में प्राप्त धन का बचा हुआ दान देंगे। अतः तुम तुरंत जाओ।” इस प्रकार नाभाग ने ऐसा ही किया जैसा उसके पिता ने सलाह दी थी और अंगिरा वंश के सभी ऋषियों ने उसे अपना पूरा धन दे दिया और फिर स्वर्गलोक चले गए।
 
Nabhaga's father further said: "Go to those great souls and recite to them two Vedic mantras related to Vaishvadeva. When those great souls finish the sacrifice and are going to heaven, they will give you the remaining dakshina received in the sacrifice. Therefore, you go immediately." So Nabhaga did as his father had advised and all the sages of the Angira clan gave him all their wealth and then they went to heaven.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)