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श्लोक 9.4.33-35  |
गवां रुक्मविषाणीनां रूप्याङ्घ्रीणां सुवाससाम् ।
पय:शीलवयोरूपवत्सोपस्करसम्पदाम् ॥ ३३ ॥
प्राहिणोत् साधुविप्रेभ्यो गृहेषु न्यर्बुदानि षट् ।
भोजयित्वा द्विजानग्रे स्वाद्वन्नं गुणवत्तमम् ॥ ३४ ॥
लब्धकामैरनुज्ञात: पारणायोपचक्रमे ।
तस्य तर्ह्यतिथि: साक्षाद् दुर्वास भगवानभूत् ॥ ३५ ॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात्, महाराजा अंबरिश ने अपने आवास में आए सभी मेहमानों, विशेषकर ब्राह्मणों को संतुष्ट किया। उन्होंने दान के रूप में साठ करोड़ गायें दीं जिनके सींग सोने के पत्तर और खुर चाँदी के पत्तर से मढ़े हुए थे। सारी गायें वस्त्रों से खूब सजाई गई थीं और उनके थन दूध से भरे थे। वे सुशील, नवयुवक और सुंदर थीं और अपने-अपने बछड़ों के साथ थीं। इन गायों का दान देने के बाद राजा ने सर्वप्रथम सभी ब्राह्मणों को भरपेट भोजन कराया और जब वे पूरी तरह से तृप्त हो गए तो उनकी आज्ञा से वे एकादशी व्रत तोड़कर उसका पारण करने वाले थे। किंतु ठीक उसी समय महान् एवं शक्तिशाली दुर्वासा मुनि अनादेय अतिथि के रूप में वहाँ पर प्रकट हुए। |
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| तत्पश्चात्, महाराजा अंबरिश ने अपने आवास में आए सभी मेहमानों, विशेषकर ब्राह्मणों को संतुष्ट किया। उन्होंने दान के रूप में साठ करोड़ गायें दीं जिनके सींग सोने के पत्तर और खुर चाँदी के पत्तर से मढ़े हुए थे। सारी गायें वस्त्रों से खूब सजाई गई थीं और उनके थन दूध से भरे थे। वे सुशील, नवयुवक और सुंदर थीं और अपने-अपने बछड़ों के साथ थीं। इन गायों का दान देने के बाद राजा ने सर्वप्रथम सभी ब्राह्मणों को भरपेट भोजन कराया और जब वे पूरी तरह से तृप्त हो गए तो उनकी आज्ञा से वे एकादशी व्रत तोड़कर उसका पारण करने वाले थे। किंतु ठीक उसी समय महान् एवं शक्तिशाली दुर्वासा मुनि अनादेय अतिथि के रूप में वहाँ पर प्रकट हुए। |
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