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श्लोक 9.4.3  |
इमे अङ्गिरस: सत्रमासतेऽद्य सुमेधस: ।
षष्ठं षष्ठमुपेत्याह: कवे मुह्यन्ति कर्मणि ॥ ३ ॥ |
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| अनुवाद |
| नाभाग के पिता बोले : अंगिरा के वंशज इस समय एक बहुत बड़ा यज्ञ करने जा रहे हैं, परंतु बड़े बुद्धिमान होने के बावजूद भी वे हर छठे दिन यज्ञ करते हुए मोहवश हो जाएँगे और अपने दैनिक कर्मों में भी गलती करेंगे। |
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| नाभाग के पिता बोले : अंगिरा के वंशज इस समय एक बहुत बड़ा यज्ञ करने जा रहे हैं, परंतु बड़े बुद्धिमान होने के बावजूद भी वे हर छठे दिन यज्ञ करते हुए मोहवश हो जाएँगे और अपने दैनिक कर्मों में भी गलती करेंगे। |
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