श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  9.4.29 
आरिराधयिषु: कृष्णं महिष्या तुल्यशीलया ।
युक्त: सांवत्सरं वीरो दधार द्वादशीव्रतम् ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
एक वर्ष तक भगवान कृष्ण की पूजा करने के लिए महाराज अम्बरीष ने अपनी रानी के साथ एकादशी और द्वादशी का व्रत धारण किया, जो उनसे उतनी ही योग्य थी।
 
Maharaja Ambarisha, along with his queen, who was equally worthy, observed the fast of Ekadasi and Dwadasi for a year to worship Lord Krishna.
तात्पर्य
एकदाशी-व्रत और द्वादशी-व्रत का पालन करने का अर्थ भगवान को प्रसन्न करना है। कृष्ण भावना में उन्नति करने की इच्छा रखने वाले व्यक्तियों को नियमित रूप से एकादशी-व्रत पालन करना चाहिए। महाराज अम्बरीष की रानी भी राजा की ही तरह समान रूप से योग्य थीं। इसलिए महाराज अम्बरीष के लिए गृहस्थ जीवन व्यतीत करना संभव था। इस संबंध में 'तुल्य-शीलाया' शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। जब तक पत्नी अपने पति के समान रूप से योग्य ना हों तब तक गृहस्थ जीवन को जारी रखना बहुत कठिन है। चाणक्य पंडित सलाह देते हैं कि ऐसी स्थिति में व्यक्ति को तुरंत गृहस्थ जीवन छोड़कर वानप्रस्थ या संन्यासी बन जाना चाहिए। "माता यस्य गृहे नास्‍ति

भाय्रा चाप्रियवादिनि

अरण्‍यं तेन गन्‍तव्‍यं

यथा-रण्यं तथा गृहम्"

जिस व्यक्ति के घर में कोई माता नहीं है और जिसकी पत्नी उसके साथ सहमत नहीं है उसे तुरंत जंगल में चले जाना चाहिए। क्योंकि मानव जीवन केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए है, किसी की पत्नी को इस प्रयास में सहायक होना चाहिए। अन्यथा गृहस्थ जीवन की कोई आवश्यकता नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)