भाय्रा चाप्रियवादिनि
अरण्यं तेन गन्तव्यं
यथा-रण्यं तथा गृहम्"
जिस व्यक्ति के घर में कोई माता नहीं है और जिसकी पत्नी उसके साथ सहमत नहीं है उसे तुरंत जंगल में चले जाना चाहिए। क्योंकि मानव जीवन केवल आध्यात्मिक उन्नति के लिए है, किसी की पत्नी को इस प्रयास में सहायक होना चाहिए। अन्यथा गृहस्थ जीवन की कोई आवश्यकता नहीं है।
