श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  9.4.27 
गृहेषु दारेषु सुतेषु बन्धुषु
द्विपोत्तमस्यन्दनवाजिवस्तुषु ।
अक्षय्यरत्नाभरणाम्बरादि-
ष्वनन्तकोशेष्वकरोदसन्मतिम् ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
महाराज अम्बरीष ने अपने घर-गृहस्थी, पत्नियाँ, सन्तानें, मित्र और सम्बन्धियों से लगाव छोड़ दिया। उन्होंने उन सर्वश्रेष्ठ और शक्तिशाली हाथियों, सुन्दर रथों, गाड़ियों, घोड़ों, अमूल्य रत्नों, आभूषणों, वस्त्रों और अपार सम्पत्ति से भी अपना लगाव छोड़ दिया। उन्होंने इन सभी वस्तुओं को नश्वर और भौतिक मानकर इनसे अपना मोह छोड़ दिया।
 
महाराज अम्बरीष ने अपने घर-गृहस्थी, पत्नियाँ, सन्तानें, मित्र और सम्बन्धियों से लगाव छोड़ दिया। उन्होंने उन सर्वश्रेष्ठ और शक्तिशाली हाथियों, सुन्दर रथों, गाड़ियों, घोड़ों, अमूल्य रत्नों, आभूषणों, वस्त्रों और अपार सम्पत्ति से भी अपना लगाव छोड़ दिया। उन्होंने इन सभी वस्तुओं को नश्वर और भौतिक मानकर इनसे अपना मोह छोड़ दिया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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