महाराज अम्बरीष ने अपने घर-गृहस्थी, पत्नियाँ, सन्तानें, मित्र और सम्बन्धियों से लगाव छोड़ दिया। उन्होंने उन सर्वश्रेष्ठ और शक्तिशाली हाथियों, सुन्दर रथों, गाड़ियों, घोड़ों, अमूल्य रत्नों, आभूषणों, वस्त्रों और अपार सम्पत्ति से भी अपना लगाव छोड़ दिया। उन्होंने इन सभी वस्तुओं को नश्वर और भौतिक मानकर इनसे अपना मोह छोड़ दिया।
Maharaja Ambarisha gave up all attachment to household chores, wives, children, friends and relatives, excellent powerful elephants, beautiful chariots, carriages, horses, inexhaustible gems, jewelry, clothes and inexhaustible treasury. He considered these things to be mortal and material and gave up attachment to them.
तात्पर्य
अनासक्तस्य विषयान यथाऽर्थमुपयुञ्जत:। भौतिक सम्पत्तियों को तभी तक स्वीकार किया जा सकता है जब तक उनका उपयोग भक्तिपूर्ण कार्य में किया जा सके। अनुकूलेन कृष्णानुशिलनम्। अनुकूल्यस्य संकल्पः प्रतिकूल्यस्य वर्जनम्। प्रचार करने में, भौतिक मानी जाने वाली कई चीज़ों की जरूरत होती है। एक भक्त को घर, पत्नी, बच्चे, दोस्त और कारों जैसे भौतिक मामलों के लिए कोई लगाव नहीं रखना चाहिए। उदाहरण के लिए, महाराजा अंबरिशा के पास ये सभी चीज़ें थीं, परन्तु उनका उनसे कोई लगाव नहीं था। यह भक्ति-योग का प्रभाव है। भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र च (भाग. 11.2.42)। जो भक्ति सेवा में उन्नत है उसका भौतिक चीज़ों से ना तो लगाव है और ना ही इंद्रियसुख के लिए है परन्तु प्रचार के लिए, भगवान की महिमा का प्रसार करने के लिए, वह ऐसी चीज़ों को बिना किसी लगाव के स्वीकार कर लेता है। अनासक्तस्य विषयान यथाऽर्थमुपयुञ्जत:। हर चीज़ का उपयोग उस हद तक किया जा सकता है जहाँ तक उसे कृष्ण की सेवा में लगाया जा सके।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥