श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  9.4.25 
संवर्धयन्ति यत् कामा: स्वाराज्यपरिभाविता: ।
दुर्लभा नापि सिद्धानां मुकुन्दं हृदि पश्यत: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग भगवान को समर्पित होकर उनके लिए कार्य करने के पारलौकिक सुख को अनुभव कर लेते हैं, वे महान योगियों की उपलब्धियों में भी कोई रुचि नहीं रखते। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये उपलब्धियाँ उस भक्त के उस पारलौकिक आनंद को और अधिक नहीं बढ़ा सकतीं जो हमेशा अपने हृदय में कृष्ण का ध्यान करता रहता है।
 
Those who are filled with the transcendental joy of serving the Lord are not interested even in the accomplishments of great yogis because such accomplishments do not add to the transcendental bliss experienced by a devotee who always thinks of Krishna within his heart.
तात्पर्य
एक निष्काम भक्त को न केवल उच्चतर ग्रह प्रणालियों में उन्नति, बल्कि रहस्यमय योग की पूर्णताओं में भी रुचि नहीं होती है। वास्तविक पूर्णता भक्ति सेवा है। निष्पक्ष ब्राह्मण में विलय होने से प्राप्त होने वाली खुशी और रहस्यमय योग की आठ पूर्णताओं (अनिमा, लगिमा, प्राप्ति आदि) से प्राप्त होने वाली खुशी भक्त को कोई सुख नहीं देती है। जैसा कि श्रील प्रबोधानंद सरस्वती ने कहा है:

कैवल्यं नरकायते त्रिदश-पूर आकाश-पुष्पायते

दुर्दान्तेन्द्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खाता-दंष्ट्रायते

विश्वं पूर्ण-सुखायते विधि-महेन्द्रादिश च कीटायते

यत् कारुण्य-कटाक्ष-वैभववतां तं गौरम एव स्तुमः

(चैतन्य-चंद्रमृत 5)

जब एक भक्त ने प्रभु चैतन्य की दया से प्रभु को दिव्य प्रेममय सेवा प्रदान करने की स्थिति प्राप्त कर ली होती है, तो वह निष्पक्ष ब्राह्मण को नर्क से बेहतर नहीं मानता है, और वह स्वर्गीय ग्रहों में भौतिक खुशी को एक भ्रम की तरह मानता है। रहस्यमय शक्तियों की पूर्णता के संबंध में, एक भक्त इसकी तुलना बिना दांत वाले जहरीले सांप से करता है। एक रहस्यमय योगी को विशेष रूप से इंद्रियों को नियंत्रित करने की चिंता होती है, लेकिन क्योंकि एक भक्त की इंद्रियां प्रभु की सेवा में लगी होती हैं (हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते) इंद्रियों के अलग से नियंत्रण की कोई आवश्यकता नहीं है। जो भौतिक रूप से लिप्त हैं उनके लिए इंद्रियों का नियंत्रण आवश्यक है, लेकिन एक भक्त की इंद्रियां सभी प्रभु की सेवा में लगी होती हैं, जिसका अर्थ है कि वे पहले से ही नियंत्रित हैं। परं दृष्ट्वा निवर्तते (भ.गी. 2.59)। एक भक्त की इंद्रियां भौतिक भोग से आकर्षित नहीं होती हैं। और भले ही भौतिक दुनिया दुखों से भरी है, भक्त इस भौतिक दुनिया को भी अध्यात्मिक मानता है क्योंकि सब कुछ प्रभु की सेवा में लगा हुआ है। आध्यात्मिक दुनिया और भौतिक दुनिया के बीच का अंतर सेवा की मानसिकता है। निबंधः कृष्ण-संबंधे युक्तं वैराग्यं उच्यते। जब परमेश्वर के प्रति सेवा की भावना नहीं होती है, तो किसी की गतिविधियाँ भौतिक होती हैं।

प्रापंचिकाताय बुद्ध्या

हरि-संबंधि-वस्तुनः

मुमुक्षुभिः परित्यागो

वैराग्यं फल्गु कथ्यते

(भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.256)

जो कुछ प्रभु की सेवा में लगा हुआ है वह भौतिक नहीं है, और इस प्रकार से जुड़ी हुई किसी भी चीज को नहीं छोड़ा जाना चाहिए। एक ऊँची गगनचुंबी इमारत के निर्माण और एक मंदिर के निर्माण में समान उत्साह हो सकता है, लेकिन प्रयास अलग-अलग होते हैं, क्योंकि एक भौतिक है और दूसरा आध्यात्मिक। आध्यात्मिक गतिविधियों को भौतिक गतिविधियों के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए और उन्हें छोड़ नहीं देना चाहिए। परमेश्वर के साथ जुड़ी किसी भी चीज़ के साथ जुड़ी कोई भी चीज़ भौतिक नहीं होती है। एक भक्त जो यह सब मानता है वह हमेशा आध्यात्मिक गतिविधियों में स्थित होता है, और इसलिए वह अब भौतिक गतिविधियों (परं दृष्ट्वा निवर्तते) से आकर्षित नहीं होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)