कैवल्यं नरकायते त्रिदश-पूर आकाश-पुष्पायते
दुर्दान्तेन्द्रिय-काल-सर्प-पटली प्रोत्खाता-दंष्ट्रायते
विश्वं पूर्ण-सुखायते विधि-महेन्द्रादिश च कीटायते
यत् कारुण्य-कटाक्ष-वैभववतां तं गौरम एव स्तुमः
(चैतन्य-चंद्रमृत 5)
जब एक भक्त ने प्रभु चैतन्य की दया से प्रभु को दिव्य प्रेममय सेवा प्रदान करने की स्थिति प्राप्त कर ली होती है, तो वह निष्पक्ष ब्राह्मण को नर्क से बेहतर नहीं मानता है, और वह स्वर्गीय ग्रहों में भौतिक खुशी को एक भ्रम की तरह मानता है। रहस्यमय शक्तियों की पूर्णता के संबंध में, एक भक्त इसकी तुलना बिना दांत वाले जहरीले सांप से करता है। एक रहस्यमय योगी को विशेष रूप से इंद्रियों को नियंत्रित करने की चिंता होती है, लेकिन क्योंकि एक भक्त की इंद्रियां प्रभु की सेवा में लगी होती हैं (हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते) इंद्रियों के अलग से नियंत्रण की कोई आवश्यकता नहीं है। जो भौतिक रूप से लिप्त हैं उनके लिए इंद्रियों का नियंत्रण आवश्यक है, लेकिन एक भक्त की इंद्रियां सभी प्रभु की सेवा में लगी होती हैं, जिसका अर्थ है कि वे पहले से ही नियंत्रित हैं। परं दृष्ट्वा निवर्तते (भ.गी. 2.59)। एक भक्त की इंद्रियां भौतिक भोग से आकर्षित नहीं होती हैं। और भले ही भौतिक दुनिया दुखों से भरी है, भक्त इस भौतिक दुनिया को भी अध्यात्मिक मानता है क्योंकि सब कुछ प्रभु की सेवा में लगा हुआ है। आध्यात्मिक दुनिया और भौतिक दुनिया के बीच का अंतर सेवा की मानसिकता है। निबंधः कृष्ण-संबंधे युक्तं वैराग्यं उच्यते। जब परमेश्वर के प्रति सेवा की भावना नहीं होती है, तो किसी की गतिविधियाँ भौतिक होती हैं।
प्रापंचिकाताय बुद्ध्या
हरि-संबंधि-वस्तुनः
मुमुक्षुभिः परित्यागो
वैराग्यं फल्गु कथ्यते
(भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.256)
जो कुछ प्रभु की सेवा में लगा हुआ है वह भौतिक नहीं है, और इस प्रकार से जुड़ी हुई किसी भी चीज को नहीं छोड़ा जाना चाहिए। एक ऊँची गगनचुंबी इमारत के निर्माण और एक मंदिर के निर्माण में समान उत्साह हो सकता है, लेकिन प्रयास अलग-अलग होते हैं, क्योंकि एक भौतिक है और दूसरा आध्यात्मिक। आध्यात्मिक गतिविधियों को भौतिक गतिविधियों के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए और उन्हें छोड़ नहीं देना चाहिए। परमेश्वर के साथ जुड़ी किसी भी चीज़ के साथ जुड़ी कोई भी चीज़ भौतिक नहीं होती है। एक भक्त जो यह सब मानता है वह हमेशा आध्यात्मिक गतिविधियों में स्थित होता है, और इसलिए वह अब भौतिक गतिविधियों (परं दृष्ट्वा निवर्तते) से आकर्षित नहीं होता है।
