श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  9.4.24 
स्वर्गो न प्रार्थितो यस्य मनुजैरमरप्रिय: ।
श‍ृण्वद्भिरुपगायद्भिरुत्तमश्लोकचेष्टितम् ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
महाराज अम्बरीष की प्रजा भगवान के गुणगान करने और उनके कार्यों के बारे में सुनने की अभ्यस्त थी। इस तरह से वे कभी भी स्वर्गलोक में जाने की इच्छा नहीं रखते थे, जो कि देवताओं के लिए भी बहुत प्रिय है।
 
The subjects of Maharaja Ambarisa were accustomed to singing and listening to the glorified activities of the Lord. Thus, they never desired to go to heaven, the most beloved planet of the demigods.
तात्पर्य
एक शुद्ध भक्त जो भगवान के पवित्र नाम के जप और श्रवण का अभ्यास करने में प्रशिक्षित किया गया है और उनके कीर्ति, गुणों, रूप, सामग्री और इसी तरह की चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं रखता है, वह स्वर्गीय ग्रहों के लिए उन्नति में कभी दिलचस्पी नहीं रखता है, भले ही ऐसी जगहें देवताओं के लिए भी बहुत प्रिय हैं।

nārāyaṇa-parāḥ sarve

na kutaścana bibhyati

svargāpavarga-narakeṣv

api tulyārtha-darśinaḥ

"भक्त जो केवल भगवान नारायण की भक्ति सेवा में लगे हुए हैं, वे जीवन की किसी भी स्थिति से नहीं डरते हैं। स्वर्गीय ग्रह, मुक्ति और नारकीय ग्रह सभी एक भक्त के लिए एक समान हैं।" (भगवान. 6.17.28) एक भक्त हमेशा आध्यात्मिक दुनिया में स्थित होता है। इसलिए वह कुछ भी नहीं चाहता है। उसे अकाम या इच्छाहीन के रूप में जाना जाता है क्योंकि उसके पास भगवान को भक्ति सेवा प्रदान करने के अलावा इच्छा रखने के लिए कुछ भी नहीं है। क्योंकि महाराज अम्बरीष भगवान के सबसे श्रेष्ठ भक्त थे, उन्होंने अपने विषयों को इस तरह से प्रशिक्षित किया कि उनके राज्य के नागरिकों को किसी भी भौतिक चीज में कोई दिलचस्पी नहीं थी, जिसमें स्वर्गीय ग्रहों की खुशी भी शामिल थी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)