nārāyaṇa-parāḥ sarve
na kutaścana bibhyati
svargāpavarga-narakeṣv
api tulyārtha-darśinaḥ
"भक्त जो केवल भगवान नारायण की भक्ति सेवा में लगे हुए हैं, वे जीवन की किसी भी स्थिति से नहीं डरते हैं। स्वर्गीय ग्रह, मुक्ति और नारकीय ग्रह सभी एक भक्त के लिए एक समान हैं।" (भगवान. 6.17.28) एक भक्त हमेशा आध्यात्मिक दुनिया में स्थित होता है। इसलिए वह कुछ भी नहीं चाहता है। उसे अकाम या इच्छाहीन के रूप में जाना जाता है क्योंकि उसके पास भगवान को भक्ति सेवा प्रदान करने के अलावा इच्छा रखने के लिए कुछ भी नहीं है। क्योंकि महाराज अम्बरीष भगवान के सबसे श्रेष्ठ भक्त थे, उन्होंने अपने विषयों को इस तरह से प्रशिक्षित किया कि उनके राज्य के नागरिकों को किसी भी भौतिक चीज में कोई दिलचस्पी नहीं थी, जिसमें स्वर्गीय ग्रहों की खुशी भी शामिल थी।
