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श्लोक 9.4.22  |
ईजेऽश्वमेधैरधियज्ञमीश्वरं
महाविभूत्योपचिताङ्गदक्षिणै: ।
ततैर्वसिष्ठासितगौतमादिभि-
र्धन्वन्यभिस्रोतमसौ सरस्वतीम् ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| उजड़े हुए मरुस्थलों में सरस्वती नदी के किनारे महाराज अम्बरीष ने अश्वमेध यज्ञ जैसे महान यज्ञों का सम्पादन करके सभी यज्ञों के स्वामी भगवान को प्रसन्न किया। ऐसे यज्ञों का सम्पादन महान ऐश्वर्य के साथ और उपयुक्त सामग्री के द्वारा करना पड़ता था, साथ ही ब्राह्मणों को दक्षिणा भी देनी पड़ती थी। इन सभी यज्ञों के निरीक्षण वसिष्ठ, असित और गौतम जैसे महान पुरूष करते थे जो यज्ञ कराने वाले राजा के प्रतिनिधि होते थे। |
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| उजड़े हुए मरुस्थलों में सरस्वती नदी के किनारे महाराज अम्बरीष ने अश्वमेध यज्ञ जैसे महान यज्ञों का सम्पादन करके सभी यज्ञों के स्वामी भगवान को प्रसन्न किया। ऐसे यज्ञों का सम्पादन महान ऐश्वर्य के साथ और उपयुक्त सामग्री के द्वारा करना पड़ता था, साथ ही ब्राह्मणों को दक्षिणा भी देनी पड़ती थी। इन सभी यज्ञों के निरीक्षण वसिष्ठ, असित और गौतम जैसे महान पुरूष करते थे जो यज्ञ कराने वाले राजा के प्रतिनिधि होते थे। |
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