स वै मन: कृष्णपदारविन्दयो-
र्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने ।
करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु
श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये ॥ १८ ॥
मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने दृशौ
तद्भृत्यगात्रस्पर्शेऽङ्गसङ्गमम् ।
घ्राणं च तत्पादसरोजसौरभे
श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते ॥ १९ ॥
पादौ हरे: क्षेत्रपदानुसर्पणे
शिरो हृषीकेशपदाभिवन्दने ।
कामं च दास्ये न तु कामकाम्यया
यथोत्तमश्लोकजनाश्रया रति: ॥ २० ॥
अनुवाद
महाराज अम्बरीष अपना मन सदैव कृष्ण के चरणकमलों का ध्यान करने में, अपने शब्दों को भगवान् का गुणगान करने में, अपने हाथों को भगवान् का मन्दिर झाडऩे-बुहारने में और अपने कान कृष्ण द्वारा या कृष्ण के बारे में बोले गए शब्दों को सुनने में लगाते थे। उन्होंने अपनी आँखों को कृष्ण की देवता, कृष्ण के मंदिरों और कृष्ण के स्थानों जैसे मथुरा और वृंदावन को देखने में लगाया, उन्होंने अपने स्पर्श की भावना को प्रभु के भक्तों के शरीर को छूने में, अपनी गंध की भावना को प्रभु को चढ़ाई गई तुलसी की सुगंध को सूंघने में और अपनी जीभ को प्रभु के प्रसाद को चखने में लगाया। उन्होंने अपने पैरों को प्रभु के पवित्र स्थानों और मंदिरों तक जाने में, अपने सिर को प्रभु के सामने झुकाने में और अपनी सभी इच्छाओं को चौबीसों घंटे प्रभु की सेवा करने में लगाया। वास्तव में, महाराज अम्बरीष ने अपनी इंद्रिय तृप्ति के लिए कभी कुछ नहीं चाहा। उन्होंने अपनी सभी इंद्रियों को भक्ति सेवा में लगाया, प्रभु से संबंधित विभिन्न कार्यों में। यही है प्रभु के प्रति आसक्ति बढ़ाने का और सभी भौतिक इच्छाओं से पूरी तरह मुक्त होने का मार्ग।
Maharaja Ambarisa always engaged his mind in meditating on the lotus feet of Krsna, his words in praising the Lord, his hands in cleaning the Lord's temple, and his ears in hearing the words spoken by or about Krsna. He engaged his eyes in seeing the Deity of Krsna, the temple of Krsna, and the places of Krsna, such as Mathura and Vrindavana. He engaged his sense of touch in touching the bodies of devotees of the Lord, his sense of smell in smelling the fragrance of the tulasi offered to the Lord, and his tongue in tasting the Lord's prasadam. He engaged his feet in going to holy places and Bhagavat temples, his head in bowing down before the Lord, and his desires in serving the Lord twenty-four hours a day. Of course, Maharaja Ambarisa never desired anything for sense gratification. He engaged all his senses in devotional activities related to the Lord. This is the way to increase attachment to the Lord and become completely free from all material desires.
तात्पर्य
भगवद्-गीता (7.1) में प्रभु अनुशंसा करते हैं - मय्य आसाक्त-मनाः पार्थ योगं युञ्जन मद्-आश्रयः। यह इंगित करता है कि भक्त के दिशानिर्देश में या सीधे परम पुरुषोत्तम के दिशानिर्देश में भक्ति सेवा का पालन करना चाहिए। हालांकि, आध्यात्मिक गुरु से बिना दिशानिर्देश के खुद को प्रशिक्षित करना असंभव है। इसलिए, श्रील रुप गोस्वामी के निर्देशों के अनुसार, भक्त का पहला कार्य एक प्रमाणित आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करना है जो उसे भगवान को पारलौकिक सेवा प्रदान करने के लिए अपनी विभिन्न इंद्रियों को लगाने के लिए प्रशिक्षित कर सकते हैं। भगवद्-गीता (7.1) में प्रभु यह भी कहते हैं - असंस्यं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छ्रृणु। दूसरे शब्दों में, यदि कोई परम पुरुषोत्तम को पूर्णता में समझना चाहता है, तो उसे महाराजा अंबरीष के पदचिन्हों का अनुसरण करके कृष्ण द्वारा दिए गए नुस्खों का पालन करना चाहिए। कहा जाता है - हृषीकण हृषीकेश-सेवनं भक्तिर उच्यतेः भक्ति का अर्थ है इंद्रियों को इंद्रिय के स्वामी, कृष्ण जो हृषीकेश या अच्युत कहलाते हैं, की सेवा में लगाना। इन शब्दों का प्रयोग इन श्लोकों में किया गया है। अच्युत-सत्-कथोदये, हृषीकेश-पदाभिवन्दने। अच्युत और हृषीकेश शब्दों का उपयोग भगवद्-गीता में भी किया गया है। भगवद-गीता कृष्ण द्वारा सीधे कही गई कृष्ण-कथा है, और श्रीमद्- भागवतम भी कृष्ण-कथा है क्योंकि भागवतम में वर्णित सब कुछ कृष्ण से ही संबंधित है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥