श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 4: दुर्वासा मुनि द्वारा अम्बरीष महाराज का अपमान  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  9.4.17 
वासुदेवे भगवति तद्भक्तेषु च साधुषु ।
प्राप्तो भावं परं विश्वं येनेदं लोष्ट्रवत् स्मृतम् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
महाराज अम्बरीष भगवान वासुदेव और भगवद्भक्त सन्त पुरुषों के परम भक्त थे। इस भक्ति के कारण वे सारे जगत को एक पत्थर के टुकड़े की तरह तुच्छ मानते थे।
 
महाराज अम्बरीष भगवान वासुदेव और भगवद्भक्त सन्त पुरुषों के परम भक्त थे। इस भक्ति के कारण वे सारे जगत को एक पत्थर के टुकड़े की तरह तुच्छ मानते थे।
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