शुकदेव गोस्वामी ने कहा : समस्त भाग्यशाली राजा अम्बरीष ने सात द्वीपों वाले सारे विश्व पर शासन किया और पृथ्वी पर अक्षय-असीम ऐश्वर्य और समृद्धि पायी। ऐसा पद पाना दुर्लभ होता है, लेकिन राजा अम्बरीष ने इसकी बिल्कुल परवाह नहीं की। वे भली-भाँति जानते थे कि ऐसा सारा वैभव भौतिक है। यह वैभव एक सपने की तरह है और अंततः नष्ट हो जाएगा। राजा जानते थे कि कोई भी अभक्त अगर ऐसा भौतिक वैभव प्राप्त कर लेता है तो वो प्रकृति के अंधकार गुण में अधिकाधिक डूबता चला जाता है।
Sukadeva Gosvami said: The most fortunate Maharaja Ambarisa ruled over the entire world consisting of seven islands and attained the inexhaustible opulence and wealth of the earth. Although such a position is rarely attained, Maharaja Ambarisa did not care about it at all because he knew that all such opulence is material. Such opulence is like a dream and will eventually be destroyed. The King knew that any nondevotee, by attaining such opulence, enters more and more into the mode of ignorance of material nature.
तात्पर्य
भक्त के लिए भौतिक समृद्धि निरर्थक है, जबकि अधभक्त के लिए भौतिक समृद्धि बंधन को बढ़ाने का कारण है, क्योंकि भक्त जानता है कि कुछ भी भौतिक अस्थायी है, जबकि एक अधभक्त अस्थायी तथाकथित खुशी को सर्वस्व मानता है और आत्म-साक्षात्कार के मार्ग को भूल जाता है। इसलिए अधभक्त के लिए भौतिक समृद्धि आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक अयोग्यता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥