शुकदेव गोस्वामी ने कहा: नभग का पुत्र नाभाग अपने गुरु के स्थान पर काफ़ी लम्बे समय तक रहा। इसके कारण उसके भाइयों ने सोचा कि वो गृहस्थ नहीं बनना चाहता और वापस नहीं लौटेगा। परिणामस्वरूप उन्होंने अपने पिता की सम्पत्ति में उसका हिस्सा ना रखते हुए आपस में बाँट लिया। जब नाभाग अपने गुरु के स्थान से वापस आया तो उन्होंने उसके हिस्से के रूप में अपने पिता को दे दिया।
Sukadeva Goswami said: Nabhaga, the son of Nabhaga, stayed with his Guru for a long time. Therefore his brothers thought that he did not want to become a householder now and would not return. Consequently they did not keep his share in their father's property but divided it among themselves. When Nabhaga returned from his Guru's place they gave him his share to his father.
तात्पर्य
ब्रह्मचारियों के दो प्रकार होते हैं। एक घर लौट सकता है, विवाह कर सकता है और गृहस्थ बन सकता है, जबकि दूसरा, जिसे बृहद-व्रत के रूप में जाना जाता है, हमेशा ब्रह्मचारी रहने का संकल्प लेता है। बृहद-व्रत ब्रह्मचारी आध्यात्मिक गुरु के स्थान से नहीं लौटता; वह वहीं रहता है, और बाद में वह सीधे संन्यास लेता है। क्योंकि नाभागा अपने आध्यात्मिक गुरु के स्थान से नहीं लौटा, उसके भाइयों ने सोचा कि उसने बृहदव्रत-ब्रह्मचर्य लिया है। इसलिए, उन्होंने उसका हिस्सा नहीं रखा, और जब वह लौटा तो उन्होंने उसे अपने पिता को उसके हिस्से के रूप में दिया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥