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bhagavat 9.3.6: यह अति विचित्र है कि हममें से किसी ने भृगु के पुत्र च्यवन मुनि के विरुद्ध अनहितकारी कर्म किया है। निस्संदेह ऐसा प्रतीत होता है कि हममें से किसी ने इस आश्रम को दूषित किया है।   |   bhagavat अध्याय 9.3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह   ।   bhagavat स्कन्ध 9: मुक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  9.3.6 
अप्यभद्रं न युष्माभिर्भार्गवस्य विचेष्टितम् ।
व्यक्तं केनापि नस्तस्य कृतमाश्रमदूषणम् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
यह अति विचित्र है कि हममें से किसी ने भृगु के पुत्र च्यवन मुनि के विरुद्ध अनहितकारी कर्म किया है। निस्संदेह ऐसा प्रतीत होता है कि हममें से किसी ने इस आश्रम को दूषित किया है।
 
How strange it is that one of us has tried to do some harm to the sage Cyavana, son of Bhrigu. Certainly, it seems that one of us has defiled this hermitage.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)