श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  9.3.22 
एवं ब्रुवाणं पितरं स्मयमाना शुचिस्मिता ।
उवाच तात जामाता तवैष भृगुनन्दन: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
किन्तु अपने सतीत्व पर गर्व करने वाली सुकन्या पिता की फटकार सुनकर मुस्कुराने लगी। उसने हँसते हुए कहा, "पिताजी, मेरे पास बैठा यह युवक आपका सच्चा दामाद है, भृगु वंश में जन्मे महान ऋषि च्यवन।"
 
But Sukanya, proud of her chastity, started smiling after hearing her father's rebuke. She said smilingly, "O father, this young man sitting next to me is your real son-in-law, born in the Bhrigu dynasty, Chyavan Muni."
तात्पर्य
यद्यपि पिता ने अपनी बेटी को इस आशंका से दंडित किया कि उसने किसी अन्य पति को स्वीकार कर लिया है। लेकिन बेटी जानती थी कि, वह पूरी तरह ईमानदार और पवित्र है। इसलिए वह मुस्कुरा रही थी। जब उसने अपने पिता को समझाया कि, उसका पति स्यावन मुनि अब एक युवा पुरुष में बदल गया है, तो उसे अपनी पवित्रता पर बहुत गर्व था। इसीलिए वह अपने पिता से बात करते समय मुस्कुरा रही थी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)