श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 3: सुकन्या तथा च्यवन मुनि का विवाह  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  9.3.16 
तान् निरीक्ष्य वरारोहा सरूपान् सूर्यवर्चस: ।
अजानती पतिं साध्वी अश्विनौ शरणं ययौ ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
सधन सौन्दर्य और सती वृत्ति वाली सुकन्या अपने पति और दोनों अश्विनीकुमारों में अंतर नहीं कर पाई क्योंकि दोनों ही समान सुन्दर थे। इस प्रकार अपने असली पति को पहचानने में असमर्थता के कारण उसने अश्विनीकुमारों की शरण ग्रहण की।
 
The pious and extremely beautiful Sukanya could not differentiate between her husband and those two Ashwinikumars because they were equally beautiful. Therefore, being unable to identify her real husband, she took refuge in the Ashwinikumars.
तात्पर्य
सु­कन्या उनमें से किसी को भी अपने पति के रूप में चयन कर सकती थी क्योंकि उनके बीच भेद नहीं किया जा सकता था, लेकिन क्योंकि वह पतिव्रता थी, उसने अश्विनी-कुमारों की शरण ली ताकि वे उसे बता सकें कि उसका वास्तविक पति कौन था। एक पतिव्रता महिला कभी भी अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष को स्वीकार नहीं करेगी, भले ही कोई उससे समान रूप से सुंदर और योग्य हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)