कस्यचित् त्वथ कालस्य नासत्यावाश्रमागतौ ।
तौ पूजयित्वा प्रोवाच वयो मे दत्तमीश्वरौ ॥ ११ ॥
अनुवाद
इसके बाद कुछ समय बीतने पर स्वर्गलोक के वैद्य दोनों अश्विनीकुमार च्यवन मुनि के आश्रम आये। उनका सत्कार करने के बाद च्यवन मुनि ने उनसे यौवन प्रदान करने की प्रार्थना की क्योंकि वे ऐसा कर सकते थे।
After some time, both the Ashwinikumars who were physicians of heaven came to the ashram of Chyavan Muni. After welcoming them, Chyavan Muni prayed to them to grant him youth as they were capable of doing so.
तात्पर्य
अश्विनी-कुमार जैसे स्वर्गीय वैद्य वृद्धावस्था में पहुंच चुके व्यक्ति को भी युवावस्था प्रदान कर सकते हैं। यथार्थ में, महायोगी अपनी रहस्यमय शक्तियों से शरीर की संरचना दुरुस्त रहने की दशा में मृत शरीर को भी जीवन प्रदान कर सकते हैं। हम इसका उल्लेख बलि महाराज के सैनिकों और शुक्राचार्य द्वारा उनके उपचार के संदर्भ में पहले ही कर चुके हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने अभी तक यह पता नहीं लगाया है कि मृत शरीर को जीवन कैसे वापस लाया जाए या वृद्ध शरीर को किस प्रकार युवावस्था की ऊर्जा प्रदान की जाए, परंतु इन श्लोकों से हम यह समझ सकते हैं कि यदि कोई वैदिक जानकारी से ज्ञान प्राप्त कर ले, तो ऐसा उपचार संभव है। अश्विनी-कुमार आयुर्वेद में निष्णात थे, जैसे कि धनवंतरि थे। भौतिक विज्ञान के प्रत्येक विभाग में एक पूर्णता प्राप्त की जानी है, और इसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को वैदिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। भगवान का भक्त बनना ही सर्वोच्च पूर्णता है। इस पूर्णता को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को श्रीमद् भागवतम का अध्ययन करना चाहिए, जिसे वैदिक इच्छा वृक्ष का पका हुआ फल माना जाता है (निगम-कल्प-तरोर गलीतं फल)।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥