श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 24: भगवान् श्रीकृष्ण  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  9.24.66 
जातो गत: पितृगृहाद् व्रजमेधितार्थोहत्वा रिपून् सुतशतानि कृतोरुदार: ।
उत्पाद्य तेषु पुरुष: क्रतुभि: समीजेआत्मानमात्मनिगमं प्रथयञ्जनेषु ॥ ६६ ॥
 
 
अनुवाद
लीला पुरुषोत्तम कहलाने वाले भगवान श्री कृष्ण वसुदेव के पुत्र रूप में प्रकट हुए। परंतु वृन्दावन में अपने विश्वासपात्र भक्तों के साथ प्रेम व्यवहार बढ़ाने के लिए वे तुरंत ही अपने पिता का घर त्यागकर वृन्दावन चले गए। वृन्दावन में उन्होंने अनेक असुरों का वध किया और फिर द्वारका वापस लौट आए। जहाँ उन्होंने वैदिक नियमों के अनुसार श्रेष्ठतम स्त्रियों के साथ विवाह किया, उनसे सैकड़ों पुत्रों को जन्म दिया और गृहस्थ जीवन के सिद्धांतों की स्थापना के लिए अपनी ही पूजा के लिए अनेक यज्ञों का आयोजन किया।
 
Lord Krishna is known as Lila Purushottam. He was born as the son of Vasudeva, but soon left his father's home and went to Vrindavan to develop loving relationships with his faithful devotees. In Vrindavan he killed many demons and then returned to Dwaraka where he married many of the best women according to Vedic rules, begot hundreds of sons from them and performed many sacrifices for his own worship to establish the principles of domestic life.
तात्पर्य
जैसा कि भगवद्-गीता (15.15) में कहा गया है, वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः: सभी वेदों द्वारा जाना जाने वाला कृष्ण है। भगवान श्री कृष्ण, अपने स्वयं के व्यवहार से एक उदाहरण स्थापित करते हुए, वेदों में वर्णित कई अनुष्ठानिक समारोह किए और वैदिक सिद्धांतों के अनुसार रहकर लोगों को सामान्य रूप से कैसे खुश रहना है, यह दिखाने के लिए कई पत्नियों से विवाह करके और कई बच्चों को जन्म देकर गृहस्थ जीवन के सिद्धांतों को स्थापित किया। वैदिक यज्ञ का केंद्र कृष्ण है (वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः)। मानव जीवन में उन्नति करने के लिए, मानव समाज को भगवान कृष्ण द्वारा उनके गृहस्थ जीवन में व्यक्तिगत रूप से प्रदर्शित किए गए वैदिक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। हालाँकि, कृष्ण के प्रकट होने का वास्तविक उद्देश्य यह बताना था कि कोई परमेश्वर के साथ प्रेम संबंधों में कैसे भाग ले सकता है। परमानंद में प्रेम संबंधों की पारस्परिकता केवल वृंदावन में ही संभव है। इसलिए वसुदेव के पुत्र के रूप में प्रकट होते ही भगवान तुरंत वृंदावन के लिए रवाना हो गए। वृंदावन में, भगवान ने न केवल अपने पिता और माता, गोपियों और ग्वालों के साथ प्रेम संबंधों में भाग लिया, बल्कि कई राक्षसों को मारकर उन्हें मुक्ति भी प्रदान की। जैसा कि भगवद्-गीता (4.8) में कहा गया है, परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम: भगवान भक्तों की रक्षा करने और राक्षसों को मारने के लिए प्रकट होते हैं। यह उनके व्यक्तिगत व्यवहार द्वारा पूरी तरह से प्रदर्शित किया गया था। भगवद्-गीता में भगवान को अर्जुन द्वारा पुरुषं शाश्वतं दिव्यम - शाश्वत, दिव्य परम व्यक्ति के रूप में समझा जाता है। यहाँ हमें उत्पद्य तेषु पुरुषः शब्द भी मिलते हैं। इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि परम सत्य पुरुष है, अर्थात व्यक्ति। अवैयक्तिक विशेषता उनके व्यक्तित्व की विशेषताओं में से केवल एक है। अंततः, वे एक व्यक्ति हैं; वह अवैयक्तिक नहीं हैं। और न केवल वह पुरुष हैं, एक व्यक्ति हैं, लेकिन वह लीला-पुरुषोत्तम हैं, सभी व्यक्तियों में सर्वश्रेष्ठ हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)