मनुष्याणां सहस्रेषु
कश्चिद यतति सिद्धये
यतातां अपि सिद्धानां
कश्चिन माम वेत्ति तत्त्वतः
"हजारों पुरुषों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील हो सकता है, और जो लोग सिद्धि प्राप्त करते हैं, उनमें से कोई एक ही मुझे सत्यता से जानता है।" जब तक व्यक्ति कृष्ण को समझने के योग्य नहीं होता है, तब तक वह पृथ्वी पर कृष्ण की उपस्थिति की सराहना नहीं कर सकता है। भोज, वृष्णियों, अंधकों, पाण्डवों और कृष्ण से घनिष्ठ रूप से संबंधित कई अन्य राजाओं में से, वृन्दावन के निवासियों और कृष्ण के बीच के घनिष्ठ संबंध पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। नित्य उत्सवं न तंत्रपुर दृशिभि: पीबंत्या: इस श्लोक में उस संबंध का वर्णन किया गया है। विशेष रूप से वृन्दावन के निवासी, जैसे गोप, गायें, बछड़े, गोपियाँ और कृष्ण के माता-पिता, वे कभी भी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं थे, भले ही वे कृष्ण के सुंदर रूप को लगातार देखते थे। कृष्ण को देखना यहाँ नित्य-उत्सव के रूप में वर्णित है, एक दैनिक उत्सव। वृंदावन के निवासी लगभग हर क्षण कृष्ण को देखते थे, किन्तु जब कृष्ण चरागाह के लिए गाँव छोड़ते थे, जहाँ वे गायों और बछड़ों की देखभाल करते थे, तो गोपियाँ बहुत अधिक पीड़ित होती थीं क्योंकि वे कृष्ण को रेत पर चलते हुए देखती थीं और सोचती थीं कि कृष्ण के कमल जैसे चरण, जिन्हें वे अपने स्तनों पर रखने की हिम्मत नहीं करती थीं क्योंकि वे अपने स्तनों को पर्याप्त नरम नहीं समझती थीं, पत्थर के टूटे हुए टुकड़ों से छिद रहे हैं। यह सोचते ही गोपियाँ प्रभावित होती थीं, और वे घर में रोती थीं। ये गोपियाँ, जो इसलिए कृष्ण की श्रेष्ठ मित्र थीं, कृष्ण को लगातार देखती थीं, किन्तु क्योंकि उनकी पलकें कृष्ण के दर्शन में बाधा डालती थीं, गोपियों ने सृष्टिकर्ता, भगवान ब्रह्मा की निंदा की। इसलिए कृष्ण की सुंदरता, विशेष रूप से उनके चेहरे की सुंदरता का वर्णन यहाँ किया गया है। नौवें सर्ग के अंत में, चौबीसवें अध्याय में, हमें कृष्ण की सुंदरता का एक संकेत मिलता है। अब हम दसवें सर्ग की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे कृष्ण का सिर माना जाता है। संपूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण कृष्ण के रूप का मूर्त रूप है, और दसवाँ सर्ग उनका चेहरा है। यह श्लोक इस बात का संकेत देता है कि उनका चेहरा कितना सुंदर है। कृष्ण के मुस्कुराते हुए चेहरे, उनके गाल, उनके होंठ, उनके कानों के आभूषण, उनके द्वारा पान का सेवन - यह सब गोपियों द्वारा बारीकी से देखा गया था, जिन्होंने इस प्रकार आध्यात्मिक आनंद का आनंद लिया, इतना अधिक कि वे कृष्ण के चेहरे को देखने के लिए कभी भी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं थीं, बल्कि इसके बजाय निर्माता की निंदा की। उनके शरीर ने पलकों को बनाया जिससे उनकी दृष्टि बाधित हुई। इसलिए कृष्ण के चेहरे की सुंदरता गोपियों द्वारा उनके गोप मित्रों या यहाँ तक कि यशोदा माता द्वारा भी अधिक सराही गई, जो कृष्ण के चेहरे को सजाने में भी रुचि रखती थीं।
