भगवान कृष्ण ने भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन, दशार्ह, कुरु, सृञ्जय और पाण्डु के वंशजों के सहयोग से अनेक कार्य संपन्न किए। अपनी मनमोहक मुस्कान, अपने स्नेहमयी व्यवहार, अपने उपदेशों और गोवर्धन पर्वत को उठाने जैसी अद्भुत लीलाओं के द्वारा भगवान ने अपने दिव्य शरीर में प्रकट होकर पूरे मानव समाज को प्रसन्न किया।
Lord Krishna performed various activities with the help of Bhoja, Vrishni, Andhaka, Madhu, Shurasena, Dasharha, Kuru, Srinjaya and the descendants of Pandu. By His charming smile, His loving behaviour, His teachings and His divine pastimes like holding the Govardhan mountain, the Lord appeared in His divine body and delighted the entire human society.
तात्पर्य
"नृलोकम रमयाम आस मूर्त्य सरवांग रम्या" ये शब्द महत्वपूर्ण हैं। कृष्ण मूल रूप हैं। भगवान, भगवान की सर्वोच्च विभूति, इसलिए यहाँ "मूर्त्य" शब्द द्वारा वर्णित किया गया है। "मूर्ति" का अर्थ है "रूप"। कृष्ण, या भगवान, कभी भी अवैयक्तिक नहीं होते हैं; अवैयक्तिक विशेषता उनके दिव्य शरीर की अभिव्यक्ति मात्र है (यस्य प्रभाव प्रभवतो जगत-अंड-कोटी)। भगवान "नर-कृती" हैं, जो बिल्कुल मनुष्य के रूप के समान है, परंतु उनका रूप हमसे भिन्न है। इसलिए "सर्वांग-रम्या" शब्द हमें सूचित करता है कि उनके शरीर का प्रत्येक अंग हर किसी को देखने में प्रिय है। उनके हंसमुख चेहरे के अलावा, उनके शरीर का हर अंग - उनके हाथ, उनके पैर, उनकी छाती - भक्तों को प्रिय है, जो किसी भी समय भगवान के उस सुंदर रूप को देखना बंद नहीं कर सकते।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥