श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 24: भगवान् श्रीकृष्ण  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  9.24.62 
यस्मिन् सत्कर्णपीयुषे यशस्तीर्थवरे सकृत् ।
श्रोत्राञ्जलिरुपस्पृश्य धुनुते कर्मवासनाम् ॥ ६२ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान् के गुणों को शुद्ध पारलौकिक कानों से सुनते मात्र से भक्तगण भौतिक वासनाओं और कामनायुक्त कर्मों से तुरन्त मुक्त हो जाते हैं।
 
Simply by receiving the glory of the Lord through purified transcendental ears, the devotees immediately become free from intense material desires and preoccupation with fruitive activities.
तात्पर्य
जब भक्तगण भगवद् गीता और श्रीमद् भागवत में वर्णित परमपुरुष भगवान की लीलाओं को भक्ति भाव से सुनते हैं, तो तुरंत ही वे एक दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेते हैं, जिसमें भौतिकवादी गतिविधियों में उनकी अब कोई रुचि नहीं रह जाती। इस प्रकार वे भौतिक संसार से मुक्त हो जाते हैं। इंद्रिय सुख के लिए, व्यावहारिक रूप से हर कोई भौतिकवादी गतिविधियों में लगा रहता है, जो जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि - जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और बीमारियों की प्रक्रिया को लम्बा खींचती हैं। परन्तु भक्त, केवल भगवद् गीता के संदेश को सुनने और श्रीमद् भागवत के कथनों का आनन्द लेने से ही इतने शुद्ध हो जाते हैं कि भौतिकवादी गतिविधियों में उनकी अब कोई दिलचस्पी नहीं रह जाती। इस समय पश्चिमी देशों के भक्त कृष्ण चेतना की ओर आकर्षित हो रहे हैं और भौतिकवादी गतिविधियों में उनकी रूची समाप्त हो रही है, इसलिए लोग इस आन्दोलन का विरोध करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन वे संभवतः इस आंदोलन को नहीं रोक सकते या यूरोप और अमेरिका में भक्तों की गतिविधियों को अपने कृत्रिम विचार थोपकर रोक नहीं सकते। यहाँ शब्द ''श्रोत्राञ्जलिर उपस्पृश्या'' इंगित करते हैं कि भगवान की दिव्य गतिविधियों को केवल सुनने से भक्तगण इतने शुद्ध हो जाते हैं कि वे तात्कालिक रूप से भौतिकवादी प्रत्युपकारी गतिविधियों के दाग से मुक्त हो जाते हैं। अन्यभिलाषित - शून्यम्। भौतिकवादी गतिविधियाँ आत्मा के लिए अनावश्यक हैं और इसलिए भक्तगण ऐसी गतिविधियों से मुक्त हो जाते हैं। भक्त मुक्ति (ब्रह्म भूयाय कल्पते) में स्थित हैं और इसलिए उन्हें उनके भौतिक घरों और भौतिक गतिविधियों में वापस नहीं बुलाया जा सकता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)