सरकार पर कब्ज़ा करने वाले राक्षसों को हालाँकि सरकारी लोगों का वेश बनाया जाता है, लेकिन सरकार के कर्तव्यों का उन्हें ज्ञान नहीं रहता। इसी कारण ईश्वर की व्यवस्था से ऐसे विशाल सौन्य शक्ति सम्पन्न राक्षसों में से एक-दूसरे से लड़ाई होती रहती है, जिससे पृथ्वी की सतह पर से राक्षसों का भार कम हो जाता है। ये राक्षस भगवान की इच्छा से अपनी सैन्य शक्तियों में वृद्धि करते हैं, ताकि उनकी संख्या कम हो जाए और भक्तों को कृष्णभावनामृत में उन्नति करने का मौका मिले।
Although the demons who usurp the government keep the disguise of government officials, they do not know the duties of the government. As a result, by the arrangement of the Supreme Lord, such great military power demons fight with each other and thus the great burden of the demons is reduced from the surface of the earth. These demons, by the will of the Lord, increase their military strength so that their numbers may be reduced and the devotees may have the opportunity to make progress in Krishna consciousness.
तात्पर्य
भगवद् गीता में (4.8) कहा गया है, परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतम्। साधु, भगवान के भक्त हमेशा कृष्ण-चेतना के कारण को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक रहते हैं ताकि बंधी हुई आत्माएं जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो सकें। लेकिन असुर, दानव, कृष्ण-चेतना आंदोलन की प्रगति में बाधा डालते हैं, और इसलिए कृष्ण कभी-कभी विभिन्न असुरों के बीच झगड़े की व्यवस्था करते हैं जो अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने में बहुत रुचि रखते हैं। सरकार या राजा का कर्तव्य अनावश्यक रूप से सैन्य शक्ति को बढ़ाना नहीं है; सरकार का वास्तविक कर्तव्य यह देखना है कि राज्य के लोग कृष्ण-चेतना में आगे बढ़ें। इस उद्देश्य के लिए, भगवद्-गीता (4.13) में कृष्ण कहते हैं, चतुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण-कर्म-विभागशः: "भौतिक प्रकृति के तीन प्रकारों और उनके द्वारा बताए गए work के अनुसार, मानव समाज के चार विभाजन मेरे द्वारा बनाए गए थे।" ऐसे पुरुषों का एक आदर्श वर्ग होना चाहिए जो वास्तविक ब्राह्मण हों, और उन्हें सभी सुरक्षा दी जानी चाहिए। नमो ब्रह्मण्य-देवाय गो-ब्राह्मण-हिताय च। कृष्ण ब्राह्मणों और गायों से बहुत प्यार करते हैं। ब्राह्मण कृष्ण-चेतना में उन्नति के कारण को बढ़ावा देते हैं, और गायें सद्भाव के रूप में शरीर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त दूध देती हैं। क्षत्रियों और सरकार को ब्राह्मणों द्वारा सलाह दी जानी चाहिए। अगला, वैश्यों को पर्याप्त भोजन का उत्पादन करना चाहिए, और शूद्र, जो स्वयं कुछ भी लाभकारी नहीं कर सकते हैं, उन्हें तीन उच्च वर्गों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) की सेवा करनी चाहिए। यह सर्वोच्च ईश्वर व्यक्तित्व की व्यवस्था है ताकि बंधी हुई आत्माएं भौतिक स्थिति से मुक्त हो जाएं और घर वापस ईश्वर के पास लौट जाएं। पृथ्वी की सतह पर कृष्ण के उतरने का यही उद्देश्य है (परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृतम्)। हर किसी को कृष्ण की गतिविधियों को समझना चाहिए (जन्म कर्म च मे दिव्यम्)। यदि कोई व्यक्ति इस पृथ्वी पर कृष्ण के आने और उनकी गतिविधियों को करने के उद्देश्य को समझता है, तो वह तुरंत मुक्त हो जाता है। यह मुक्ति सृष्टि का उद्देश्य है और पृथ्वी की सतह पर कृष्ण का अवतरण है। राक्षस एक ऐसी योजना को आगे बढ़ाने में बहुत रुचि रखते हैं जिसके द्वारा लोग बिल्लियों, कुत्तों और सूअरों की तरह कड़ी मेहनत करेंगे, लेकिन कृष्ण के भक्त कृष्ण-चेतना सिखाना चाहते हैं ताकि लोग सादे जीवन और कृष्ण-चेतन प्रगति से संतुष्ट रहें। यद्यपि राक्षसों ने उद्योग और कठिन परिश्रम के लिए कई योजनाएँ बनाई हैं ताकि लोग जानवरों की तरह दिन-रात काम करें, लेकिन यह सभ्यता का उद्देश्य नहीं है। इस तरह के प्रयास जगताहिताः हैं; अर्थात, वे आम लोगों के दुर्भाग्य के लिए हैं। क्षायेया: ऐसी गतिविधियों से विनाश होता है। जो व्यक्ति कृष्ण को, परम व्यक्तित्व भगवान को समझता है, उसे कृष्ण-चेतना आंदोलन के महत्व को गंभीरता से समझना चाहिए और इसमें गंभीरता से भाग लेना चाहिए। किसी को भी उग्र-कर्म, या इंद्रिय-तृप्ति के लिए अनावश्यक काम के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए। नूनं प्रमत्तः कुरुते विकर्म यद् इंद्रिया-प्रीतया आर्पणोति (भाग। 5.5.4)। केवल इंद्रिय सुख के लिए, लोग भौतिक सुख के लिए योजनाएँ बनाते हैं। माया-सुखाय भरम उद्वहतो विमूढ़ान (भाग। 7.9.43)। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे सभी विमूढ़, बदमाश हैं। टिमटिमाती खुशी के लिए, लोग अपनी मानवीय ऊर्जा बर्बाद करते हैं, कृष्ण-चेतना आंदोलन के महत्व को नहीं समझते हैं, बल्कि सरल भक्तों पर ब्रेनवॉश करने का आरोप लगाते हैं। राक्षस कृष्ण-चेतना आंदोलन के प्रचारकों पर गलत आरोप लगा सकते हैं, लेकिन कृष्ण राक्षसों के बीच एक लड़ाई की व्यवस्था करेंगे जिसमें उनकी सारी सैन्य शक्ति लगी होगी और राक्षसों के दोनों पक्षों का सर्वनाश हो जाएगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥