ममैवांशो जीव-लोके
जीव-भूतः सनातनः
मनः षष्टानींद्रियाणि
प्रकृति-स्थानी कर्षति
"इस सशर्त संसार में जीवित प्राणी मेरे सनातन, अंश हैं। सशर्त जीवन के कारण, वे छह इंद्रियों के साथ बहुत कठिन संघर्ष कर रहे हैं, जिसमें मन भी शामिल है।" सभी जीवित प्राणी भगवान के परम व्यक्तित्व का अंग हैं और गुणात्मक रूप से भगवान जितने ही अच्छे हैं, लेकिन मात्रात्मक रूप से उनके बीच एक महान अंतर है, क्योंकि भगवान असीमित हैं जबकि जीवित प्राणी सीमित हैं। इस प्रकार भगवान में आनंद के लिए असीमित क्षमता है, और जीवित प्राणियों में आनंद की सीमित क्षमता है। आनंदमयो'भ्यासात् (वेदांत-सूत्र 1.1.12)। भगवान और जीवित प्राणी दोनों, गुणात्मक रूप से आत्मा होने के नाते, शांतिपूर्ण आनंद की प्रवृत्ति रखते हैं, लेकिन जब भगवान का वह भाग दुर्भाग्य से कृष्ण के बिना, स्वतंत्र रूप से आनंद लेना चाहता है, तो उसे भौतिक संसार में डाल दिया जाता है, जहां वह ब्रह्मा के रूप में अपना जीवन शुरू करता है और धीरे-धीरे मल में चींटी या कीड़े की स्थिति में आ जाता है। इसे मन: षष्टानींद्रियाणि प्रकृति-स्थानी कर्षति कहते हैं। अस्तित्व के लिए एक महान संघर्ष है क्योंकि प्रकृति द्वारा सशर्त जीव प्रकृति के पूर्ण नियंत्रण में है (प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्मणि सर्वशः)। अपने सीमित ज्ञान के कारण, जीवित प्राणी सोचता है कि वह इस भौतिक दुनिया में आनंद ले रहा है। मन: षष्टानींद्रियाणि प्रकृति-स्थानी कर्षति। वह वास्तव में प्रकृति के पूर्ण नियंत्रण में है, लेकिन फिर भी वह खुद को स्वतंत्र समझता है (अहंकार-विमूढ़ात्मा कर्ताहम् इति मन्यते)। तब भी जब वह सैद्धांतिक ज्ञान से ऊपर उठ जाता है और ब्रह्म के अस्तित्व में विलय करने का प्रयास करता है, वही रोग जारी रहता है। आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतंति अधः (भाग। 10.2.32)। उस परम पदम को प्राप्त करने के बाद भी, अवैयक्तिक ब्रह्म में विलय होने के बाद, वह फिर से भौतिक दुनिया में गिर जाता है।
इस तरह, सशर्त आत्मा इस भौतिक दुनिया में अपने अस्तित्व के लिए एक महान संघर्ष से गुजरती है, और इसलिए भगवान, उसके लिए करुणा से, इस दुनिया में प्रकट होते हैं और उसे निर्देश देते हैं। इस प्रकार भगवान भगवद-गीता (4.7) में कहते हैं:
यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानं अधर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्य अहम्
"कभी भी और जहाँ भी धार्मिक आचरण में गिरावट आती है, हे भरत के वंशज, और अधर्म का प्रबल उदय होता है - उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।" असली धर्म कृष्ण को समर्पण करना है, लेकिन विद्रोही जीवित प्राणी, कृष्ण को समर्पण करने के बजाय, कृष्ण की तरह बनने के लिए अस्तित्व के संघर्ष में अधर्म में संलग्न होता है। इसलिए कृष्ण करुणा से जीवित प्राणी को उसकी वास्तविक स्थिति को समझने का मौका देने के लिए इस भौतिक दुनिया का निर्माण करते हैं। भगवद गीता और इसी तरह के वैदिक साहित्य प्रस्तुत किए जाते हैं ताकि जीव कृष्ण के साथ अपने संबंध को समझ सके। वेदैश्च सर्वैर अहम् एव वेद्यः (भग। 15.15)। ये सभी वैदिक साहित्य मानव को यह समझने में सक्षम बनाने के लिए हैं कि वह क्या है, उसकी वास्तविक स्थिति क्या है, और भगवान के परम व्यक्तित्व के साथ उसका क्या संबंध है। इसे ब्रह्म- जिज्ञासा कहा जाता है। प्रत्येक सशर्त आत्मा संघर्ष कर रही है, लेकिन मानव जीवन उसे अपनी स्थिति को समझने का सबसे अच्छा मौका प्रदान करता है। इसलिए यह श्लोक कहता है, अनुग्रह तन-निवृत्तेः, यह दर्शाता है कि जन्म और मृत्यु के बार-बार होने वाले झूठे जीवन को रोका जाना चाहिए और सशर्त आत्मा को शिक्षित किया जाना चाहिए। सृष्टि का यही उद्देश्य है।
जैसा कि नास्तिक लोग सोचते हैं, सृष्टि मनमाने ढंग से उत्पन्न नहीं होती है।
असत्यम अप्रतिष्ठं ते
जगद आहुर अनिश्वरम
अपरापर-सम्भूतं
किम अन्यत काम-हैतुकं
वे कहते हैं कि यह संसार अवास्तविक है, इसका कोई आधार नहीं है और इसे नियंत्रित करने के लिए कोई भगवान नहीं है। यह काम इच्छा से बनाया गया है और इसका कामवासना के अलावा और कोई कारण नहीं है। (भगवद्गीता 16.8) नास्तिक धूर्त सोचते हैं कि कोई भगवान नहीं है और निर्माण संयोग से हुआ है, जैसे एक पुरुष और महिला संयोग से मिलते हैं और महिला गर्भवती होकर बच्चे को जन्म देती है। वास्तव में, हालांकि, तथ्य यह नहीं है। तथ्य यह है कि इस रचना का एक उद्देश्य है: सशर्त आत्मा को उसकी मूल चेतना, कृष्ण चेतना में लौटने का मौका देना और फिर घर लौटने के लिए, भगवान तक वापस जाना और आध्यात्मिक दुनिया में पूरी तरह से खुश रहना। भौतिक दुनिया में सशर्त आत्मा को अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने का मौका दिया जाता है, लेकिन साथ ही उसे वैदिक ज्ञान द्वारा सूचित किया जाता है कि यह भौतिक दुनिया सुख के लिए उसका वास्तविक स्थान नहीं है। जन्म-मृत्यु-जर-व्याधि-दुःख-दोषानुदर्शनम् (भगवद्गीता 13.9)। जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति को रोकना होगा। इसलिए, प्रत्येक मनुष्य को कृष्ण और कृष्ण के साथ उसके संबंधों को समझकर इस सृष्टि का लाभ उठाना चाहिए और इस तरह घर लौटना चाहिए, भगवान के पास वापस जाना चाहिए।
