अमोघं देवसन्दर्शमादधे त्वयि चात्मजम् ।
योनिर्यथा न दुष्येत कर्ताहं ते सुमध्यमे ॥ ३४ ॥
अनुवाद
सूर्यदेव ने बोला: हे सुंदर पृथा, देवताओं से तेरी मुलाकात निष्फल नहीं जा सकती। इसलिए, मैं तेरे गर्भ में अपना बीज रख रहा हूँ, ताकि तू एक पुत्र को जन्म दे। मैं तेरे कौमार्य को अक्षत रखने की व्यवस्था करूँगा, क्योंकि तू अभी भी एक अविवाहित कन्या है।
Suryadev said: O beautiful Pritha, your gift to the gods cannot go in vain. Therefore I will place semen in your womb so that you can give birth to a son. I will make arrangements to keep your virginity intact because you are still an unmarried girl.
तात्पर्य
वैदिक सभ्यता के अनुसार, यदि किसी लड़की के विवाह से पहले ही वह गर्भवती हो जाए, तो कोई उससे विवाह नहीं करता। इसलिए हालाँकि सूर्यदेव पृथा के सामने प्रकट होने के बाद उसे एक बच्चा देना चाहते थे, किंतु पृथा ने हिचकिचाहट की क्योंकि वह अभी भी अविवाहित थी। उसकी कुमारी अवस्था को अछूती रखने के लिए, सूर्यदेव ने ऐसा प्रबंध किया जिससे वह एक बच्चे को जन्म दे, जो उसके कान से निकले, और इसलिए उस बच्चे को कर्ण के नाम से जाना गया। यह प्रथा है कि एक लड़की का विवाह अक्षत-योनि होना चाहिए, अर्थात उसकी कुमारी अवस्था अछूती हो। किसी लड़की को कभी भी अपने विवाह से पहले बच्चा नहीं उठाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥