विद्या-विऩय-संपन्ने
ब्राह्मणे गवि हस्तिनि
शुनी चैव श्व-पाके च
पण्डिताः सम-दर्शिनः
"कर्मों का त्याग करने वाला, बुद्धिमान, अध्यात्मिक ज्ञान के धनी और विनम्र, ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और कुत्ते खाने वाले [अछूतों] को समान रूप से देखता है।" एक पंडित, या विद्वान व्यक्ति, हर जीव में भगवान के व्यक्तित्व को महसूस करता है। इसलिए, यद्यपि आजकल तथाकथित दारिद्र-नारायण, या "गरीब नारायण" को तरजीह देना फैशन बन गया है, रंतिदेव के लिए किसी एक व्यक्ति को तरजीह देने का कोई कारण नहीं था। यह विचार कि क्योंकि नारायण दारिद्र, या गरीब के हृदय में निवास करता है, इसलिए गरीब व्यक्ति को दारिद्र-नारायण कहना चाहिए गलत धारणा है। इस तर्क से, क्योंकि भगवान कुत्तों और सूअरों के हृदय में निवास करता है, कुत्ते और सूअर भी नारायण होंगे। यह गलत धारणा नहीं होनी चाहिए कि रंतिदेव इस विचार से सहमत थे। इसके बजाय, उन्होंने हर किसी को भगवान के व्यक्तित्व का अंग (हरि-सम्बन्धी-वस्तुः) माना है। यह नहीं है कि हर कोई भगवान है। ऐसे सिद्धांत, जो मायावाद दर्शन द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं, हमेशा भ्रामक होते हैं, और रंतिदेव ने कभी इसे स्वीकार नहीं किया होगा।
