श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 21: भरत का वंश  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  9.21.25 
स कृत्व्यां शुककन्यायां ब्रह्मदत्तमजीजनत् ।
योगी स गवि भार्यायां विष्वक्सेनमधात् सुतम् ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
शुक की पुत्री कृत्वी, राजा नीप की पत्नी थी। कृत्वी के गर्भ से नीप को ब्रह्मदत्त नाम का पुत्र हुआ। ब्रह्मदत्त एक महान योगी थे। उनकी पत्नी सरस्वती के गर्भ से विष्वक्सेन नाम का पुत्र हुआ।
 
From the womb of Shuka's daughter, i.e. Neep's wife Kritivi, a son named Brahmadatta was born to King Neep. Brahmadatta was a great yogi. From the womb of his wife Saraswati a son named Vishvaksena was born.
तात्पर्य
यहाँ उल्लिखित शुक, शुकदेव गोस्वामी से भिन्न हैं जिन्होंने श्रीमद् भागवतम् की वाणी की। व्यासदेव के पुत्र, शुकदेव गोस्वामी का विस्तृत वर्णन ब्रह्म-वैवर्त पुराण में मिलता है। वहाँ कहा गया है कि व्यासदेव ने जाबालि की पुत्री को अपनी पत्नी के रूप में रखा था और जब उन्होंने कई वर्षों तक मिलकर तपस्या की, तो उन्होंने उनके गर्भ में अपना बीज रखा। बच्चा बारह वर्षों तक अपनी माँ के गर्भ में रहा, और जब पिता ने पुत्र को बाहर आने के लिए कहा, तो पुत्र ने उत्तर दिया कि वह तब तक बाहर नहीं आएगा जब तक कि वह माया के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो जाता। व्यासदेव ने तब बच्चे को आश्वासन दिया कि वह माया से प्रभावित नहीं होगा, लेकिन बच्चा अपने पिता पर विश्वास नहीं करता था, क्योंकि पिता अभी भी अपनी पत्नी और बच्चों से जुड़ा हुआ था। व्यासदेव फिर द्वारका गए और भगवान को अपनी समस्या के बारे में बताया। व्यासदेव के अनुरोध पर, भगवान व्यासदेव की कुटिया में गए, जहाँ उन्होंने गर्भ में पल रहे बच्चे को आश्वासन दिया कि माया उसे प्रभावित नहीं करेगी। इस प्रकार आश्वस्त होकर, बच्चा बाहर आया, लेकिन वह तुरंत एक परिव्राजकाचार्य के रूप में चला गया। जब पिता बहुत दुखी होकर अपने संत पुत्र शुकदेव गोस्वामी का अनुसरण करने लगे, तो लड़के ने एक डुप्लीकेट शुकदेव बनाया, जो बाद में पारिवारिक जीवन में प्रवेश कर गया। इसलिए, इस श्लोक में उल्लिखित शुक-कन्या या शुकदेवा की पुत्री, डुप्लीकेट या नकली शुकदेव की पुत्री है। मूल शुकदेव आजीवन ब्रह्मचारी थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)