श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 21: भरत का वंश  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  9.21.16 
स वै तेभ्यो नमस्कृत्य नि:सङ्गो विगतस्पृह: ।
वासुदेवे भगवति भक्त्या चक्रे मन: परम् ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
राजा रन्तिदेव की इच्छा कभी नहीं रही कि वो देवताओं से कोई भी भौतिक लाभ प्राप्त करें। उन्होंने उन्हें प्रणाम तो किया परन्तु चूंकि उनका दिल परमेश्वर विष्णु अथवा वासुदेव के लिए लगा हुआ था, इसलिए उन्होंने अपने मन को पूर्णतया भगवान् विष्णु के कमल चरणों में स्थिर कर लिया।
 
King Rantidev had no desire to obtain any material benefit from the demigods. He bowed down to them, but being enamoured with Lord Vishnu or Vasudeva, he fixed his mind on the lotus feet of Lord Vishnu.
तात्पर्य
श्रील नरसिंह दास ठाकुर ने गाया है:

अन्य देवाश्रय नाई, तोमारे कहिनु भाई,

एइ भक्ति परम करण

यदि कोई परमेश्वर का शुद्ध भक्त बनना चाहता है तो उसे देवताओं से आशीर्वाद लेने के लिए हांकना नहीं चाहिए। जैसा कि भगवद-गीता (7.20) में कहा गया है, कामैस्तैस्तैर्हृता-ज्ञानः प्रपद्यन्तेऽन्य-देवताः: भौतिक ऊर्जा के भ्रम से मूर्ख लोग भगवान विष्णु के अलावा अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। इसलिए, यद्यपि रंतीदेव भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव को व्यक्तिगत रूप से देखने में सक्षम थे, लेकिन वे उनसे भौतिक लाभ लेने के लिए उत्सुक नहीं थे। बल्कि उन्होंने भगवान वासुदेव पर अपने मन को स्थिर किया और उनके प्रति भक्ति सेवा की। यह एक शुद्ध भक्त का चिन्ह है, जिसका हृदय भौतिक इच्छाओं से मिलावट नहीं किया जाता है।

अन्याभिलाषिता-शून्यं

ज्ञान-कर्मद्य-अनावृतम्

अनुकूल्येन कृष्णानु-

शीलनं भक्तिर उत्तमा

“बिना किसी भौतिक लाभ या फल के इच्छा या दार्शनिक अटकल के माध्यम से भगवान कृष्ण के प्रति हृदय से प्यार करने वाली सेवा करनी चाहिए। इसे शुद्ध भक्ति सेवा कहा जाता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)